(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
उत्तराखंड के चंपावत जनपद में स्थित मां पूर्णागिरि धाम उत्तर भारत के प्रमुख 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है। समुद्र तल से लगभग 5,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र मंदिर हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। विशेष रूप से चैत्र मास के मेले के दौरान यहां भक्तों का विशाल जनसमूह उमड़ पड़ता है। मां के दर्शन के साथ-साथ हिमालय का प्राकृतिक सौंदर्य, घने वन एवं गहरी घाटियों का मनोरम दृश्य इस यात्रा को आध्यात्मिक और रोमांचक दोनों बना देते हैं।
ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ आसपास का दृश्य और भी मनोहारी होता जाता है। दूर तक फैली हिमालयी पर्वतमालाएं यात्रा को यादगार बना देती हैं।
पूर्णागिरि तक पहुंचने का मार्ग
पूर्णागिरि धाम का सबसे प्रमुख आधार नगर टनकपुर है, जो सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। टनकपुर पहुंचने के बाद श्रद्धालु वाहन से मंदिर के प्रवेश क्षेत्र तक जाते हैं। इसके बाद पर्वत पर पैदल चढ़ाई आरंभ होती है। मार्ग में सीढ़ियां, ढलान व घुमावदार रास्ते हैं। मंदिर परिसर के निकट निजी स्तर पर कई विश्राम स्थल बने हुए हैं, जहां श्रद्धालु थोड़ी देर रुककर आगे की यात्रा जारी रखते हैं।
रास्ते भर छोटी-छोटी दुकानों, प्रसाद केंद्रों और चाय-नाश्ते के ठिकानों के कारण यात्रियों को आवश्यक सुविधाएं मिल जाती हैं।
शक्तिपीठ के रूप में धार्मिक महत्त्व
हिंदू परंपरा में मां पूर्णागिरि को प्रमुख सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार देवी सती के अंगों के पृथ्वी पर गिरने से जिन स्थानों पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई, उनमें पूर्णागिरि भी है। मान्यता है कि यहां देवी की नाभि गिरी थी। इसी कारण यहां दर्शन और पूजा-अर्चना का विशेष धार्मिक महत्व है। अनेक श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां आकर पूजा करते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः दर्शन के लिए लौटते हैं। चैत्र नवरात्र के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूरे क्षेत्र में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का अनूठा वातावरण देखने को मिलता है।
हिमालयी पर्वतों की गोद में बसा धाम
पूर्णागिरि धाम हिमालय के कुमाऊं क्षेत्र की पर्वतीय श्रृंखलाओं के बीच स्थित है। यहां का भूभाग तीव्र ढलानों, चट्टानी संरचनाओं और घने वनों से युक्त है। यात्रा के दौरान अनेक स्थानों से नीचे बहती शारदा नदी का सुंदर दृश्य दिखाई देता है, जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक शोभा को और बढ़ा देता है।
स्थानीय स्तर पर आसपास की ऊंची चोटियों और पर्वतीय भागों को विभिन्न पारंपरिक नामों से भी पुकारा जाता है। यही कारण है कि यात्रियों को अलग-अलग संदर्भों में भिन्न नाम सुनने को मिल सकते हैं, लेकिन पूरे क्षेत्र की पहचान हिमालय की कुमाऊं मंडल की अन्नपूर्णा पर्वत श्रंखला और मां पूर्णागिरि के पवित्र धाम के कारण ही है।
प्रकृति और साहस का अनूठा अनुभव
पूर्णागिरि की यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शारीरिक धैर्य और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा है। लगातार चढ़ाई, लंबी सीढ़ियां और पहाड़ी मार्ग यात्रियों से संयम और सावधानी की अपेक्षा करते हैं। हालांकि मार्ग में उपलब्ध विश्राम स्थल और स्थानीय लोगों का सहयोग यात्रा को अपेक्षाकृत सुगम बना देता है।
ऊपर पहुंचने पर पर्वतों की ऊंचाइयों से दिखाई देने वाला विहंगम दृश्य और मंदिर परिसर का आध्यात्मिक वातावरण सारी थकान भुला देता है। यही कारण है कि अधिकांश श्रद्धालु इस यात्रा को जीवन का अविस्मरणीय अनुभव मानते हैं।
आस्था और पर्यटन का संगम
मां पूर्णागिरि धाम धार्मिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही प्रकृति प्रेमियों और पर्वतीय पर्यटन के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यहां आने वाले लोग दर्शन के साथ-साथ स्वच्छ हवा, हरियाली और शांत प्राकृतिक परिवेश का भी भरपूर आनंद लेते हैं। इस प्रकार पूर्णागिरि धाम श्रद्धा, संस्कृति, प्रकृति और साहसिक अनुभव का ऐसा संगम प्रस्तुत करता है, जो हर यात्री के मन पर अमिट छाप छोड़ जाती है।