◆ दोपहर के पावन क्षण में सूर्य की किरणों ने किया तिलक, जयघोष से गूंज उठा परिसर
◆ देश–विदेश से पहुंचे श्रद्धालु, परंपरा और तकनीक के समन्वय ने रचा अद्भुत दृश्य
अयोध्या। रामनवमी के अवसर पर अयोध्या में इस वर्ष भक्ति और आध्यात्म का ऐसा अद्वितीय संगम देखने को मिला, जिसने श्रद्धालुओं को गहरे भावलोक में पहुंचा दिया। दोपहर ठीक 12 बजे, भगवान श्रीराम के जन्म के पावन क्षण पर जब मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहा था, उसी समय सूर्य की किरणों ने रामलला के मस्तक को स्पर्श कर दिव्य सूर्य तिलक का साक्षात दृश्य प्रस्तुत किया।
यह क्षण केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समन्वय का भी प्रतीक बनकर सामने आया। विशेष रूप से तैयार की गई ऑप्टिकल व्यवस्था के माध्यम से सूर्य की किरणों को इस प्रकार निर्देशित किया गया कि वे ठीक निर्धारित समय पर भगवान के विग्रह के मस्तक पर केंद्रित हों। जैसे ही यह दृश्य साकार हुआ, मंदिर परिसर “जय श्रीराम” के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा और उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
रामनगरी में सुबह से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था। प्रमुख मार्गों से लेकर मंदिर परिसर तक हर ओर भक्तों की लंबी कतारें देखी गईं। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए चरणबद्ध दर्शन व्यवस्था लागू की थी। प्रातः काल से ही दर्शन शुरू कर दिए गए थे, जिससे दूर–दराज से आए श्रद्धालु बिना अव्यवस्था के अपने आराध्य के दर्शन कर सकें।
पूर्वाह्न लगभग साढ़े दस बजे से रामलला के अभिषेक का सीधा प्रसारण विभिन्न माध्यमों पर किया गया। वैदिक रीति से पंचामृत अभिषेक के दौरान पूरे वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार महसूस किया गया। मंदिर परिसर में उपस्थित संत–महात्माओं और आचार्यों के मंत्रोच्चार ने आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ा दिया।
मध्याह्न आरती के समय पूरा वातावरण भक्ति में डूबा नजर आया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण अयोध्या एक साथ प्रभु श्रीराम के स्वागत में समर्पित हो गई हो। घाटों, मंदिरों और सड़कों पर उमड़ी भीड़ ने इस आयोजन को एक विराट जनआस्था के उत्सव में परिवर्तित कर दिया।
धार्मिक मान्यताओं के साथ आधुनिक तकनीक के संयोजन ने इस बार के रामनवमी उत्सव को विशेष बना दिया। सूर्य तिलक का यह दृश्य न केवल देश में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आकर्षण का केंद्र बना।