Thursday, April 16, 2026
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भूगोल और खगोलशास्त्र का आधार स्तंभ भारतीय संवत्सर–विद्यावाचस्पति उदयराज मिश्र


अम्बेडकर नगर। प्राचीन भारतीय वांग्मय और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सृष्टि अनादि है।जिसके कारण इसके प्रादुर्भाव के निर्धारित कालखंड की गणना नहीं की जा सकती।किंतु वैवस्वत मनु की कल्प आधारित गणनाओं के आधार पर इसे सतयुग,त्रेता,द्वापर और कलियुग चार युगों में विभाजित किया गया है। जिसका वृहद और स्पष्ट उल्लेख स्मृति सार नामक प्राचीन ग्रंथ में भी मिलता है।स्मृति सार में वर्ष की परिभाषा को वर्णित करते हुए लिखा गया है कि –

द्वादश मासा: वस्तर: अर्थात बारह महीनों का काल विशेष।जिसे ही सम+वत्सर अर्थात पूरा वर्ष कहा जाता है।

    दर्शनशास्र और मनोविज्ञान दोनों की तरह भारतीय ग्रन्थ उन्मुक्त भाव से कार्य – कारण सिद्धांत की पुष्टि करते हैं।जिनके अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई कारण और कार्य करने का निर्धारित समय होता है।ऐसा कोई कार्य हो ही नहीं सकता जो समय से इतर घटित हो सके।यही कारण है कि भूत,वर्तमान और भविष्य तीनों कालों का सीधा संबंध समय विशेष पर घटित घटनाओं से ही होता है।घटना विहीन काल परिभाषित ही नहीं हो सकता है।ऐसे में यह यक्ष प्रश्न उठता है कि आखिर भारतीय नववर्ष जिसे कि विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है उसे चैत्र प्रतिपदा से ही क्यों आरंभ किया गया?इसी के साथ यह प्रश्न भी उतना ही विचारणीय है कि जब विक्रम संवत से पूर्व सप्तर्षि संवत,कलियुग संवत् और युधिष्ठिर संवत प्रचलित थे तो फिर विक्रम संवत की आवश्यकता क्यों पड़ी?

   वस्तुत:भारतीय खगोलशास्त्र और ज्योतिष शास्त्र विशुद्ध रूप से गणितीय गणनाओं व वैज्ञानिक व्याख्याओं तथा अनुप्रयोगों पर आधारित हैं।भारतीय गणितज्ञों,ज्योतिषशास्त्रियों और खगोल वैज्ञानिकों ने आज से हजारों,लाखों वर्ष पूर्व ग्रहों,नक्षत्रों और उनकी गतियों आदि से संबंधित जो सटीक व्याख्याएं की हैं,उन्हें देखकर,पढ़कर आज के वैज्ञानिक भी दंग हों जाते हैं।कदाचित भारतीय ज्योतिषशास्त्र ही है कि आज से पचास और सौ वर्ष आगे भी ग्रहीय दशाओं और मौसम आधारित परिवर्तनों की भविष्यवाणी कर सकता है,जोकि अभी तक वैश्विक स्तर पर मौसम वैज्ञानिकों और व्याख्याताओं के लिए असंभव ही है।

  यह सत्य है कि ईसा से 3076 वर्ष पूर्व भारत में सप्तर्षि संवत  और 3102 वर्ष पूर्व कलियुग संवत् तथा उसके पश्चात युधिष्ठिर संवत प्रचलित थे।किंतु इनमें से कोई भी संवत भारतीय पर्वों,उत्सवों और चन्द्र तथा सौर आधारित गणनाओं की दृष्टि से व्यापक उपयोग में नहीं था।यही कारण है की उज्जैन नरेश महाराज चंद्रगुप्त द्वितीय ने जब बाह्य आक्रांता के रूप में भारत पर आक्रमण करने वाले शकों को युद्ध में बुरी तरह हराकर भारतीयों की रक्षा की तो उन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।शकों को परास्त करने पर भारतीय काल गणनाओं को वैज्ञानिक रूप देने के लिए उन्होंने विद्वानों द्वारा तैयार किए गए संवत को चैत्र प्रतिपदा के दिन,जोकि ग्रेगोरियन कैलेंडर से 57वर्ष पहले था को विक्रम संवत के नाम से प्रतिपादित किया,जोकि विश्व के किसी भी कैलेंडर की तुलना से सर्वाधिक वैज्ञानिक,विशिष्ट और सटीक काल गणनाएं प्रस्तुत करता है।

   चैत्र प्रतिपदा के दिन ही विक्रम संवत के प्रतिपादन के पीछे का मूल रहस्य ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि रचना के समय से जुड़ा हुआ है। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना के दिन अर्थात चैत्र प्रतिपदा को प्रवरा नामक तिथि निश्चित की थी।इस तिथि की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किए गए सभी कार्य,पुण्य और उपाय अत्यंत सफल और प्रभावी होते हैं।इस तिथि को सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों आदि में भी परम पुनीत माना गया है।ब्रह्मपुराण में लिखा गया है कि –

चैत्र मासि जगत ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेsहनि, शुक्लपक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति ।

  विक्रम संवत इसलिए भी चैत्र प्रतिपदा के दिन से आरंभ किए जाने का मूल कारण यह था कि यदि इसे कृष्णपक्ष से शुरू करते तो चन्द्र और सौर नक्षत्रों के वर्षों के चलते मलमास से शुरू करना पड़ता।यही कारण है कि इसमें पूर्णिमा के पश्चात नए महीने की शुरुआत कृष्णपक्ष से होती है।इसके अतिरिक्तविक्रम संवत को चैत्र प्रतिपदा से आरंभ का मूल कारण यह भी है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की है,परमब्रह्म के प्रथम मत्स्यावतार की तिथि भी यही दिन है।

  विक्रम संवत ही अन्य सभी धर्मों,पंथों,संप्रदायों और की स्वयं में भारत में प्रचलित अन्य पंचागों से सर्वश्रेष्ठ क्यों है?यह भी विचारणीय है।वस्तुत: विक्रम संवत ही दुनियां का एकमात्र और पहला पंचांग है जिसमें खगोल शास्त्र,ज्योतिषशास्त्र के साथ ही साथ वैज्ञानिक तथ्यों की भी स्पष्ट व्याख्या है।यह चंद्र मास और सौर नक्षत्र वर्ष पर विशुद्ध रूप से आधारित है। विक्रम संवत आधारित पंचांग के अनुसार चंद्रमा 354 दिनों में पृथ्वी की 12 और पृथ्वी 365 दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा करती है।यही कारण है कि एक वर्ष में 12 माह होने की संकल्पना केवल विक्रम संवत में की गई है,जोकि अन्यत्र कहीं नहीं दिखती।सौर वर्ष चंद्रवर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल अधिक होता है,जो प्रत्येक तीन वर्ष में एक महीने के बराबर हो जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक तीन वर्षों में अधिकमास अर्थात मलमास की व्यवस्था इसी पंचांग में मिलती है

विक्रम संवत आधारित पंचांग में ही सर्वप्रथम एक वर्ष को 12 महीनों,1महीने को 30 दिनों और दो पक्षों तथा चार सप्ताहों में विभक्त किया गया है,जोकि आज पूरी दुनियां में सर्वमान्य है।

  अंग्रेजी कैलेंडर,जिसे कि ग्रिगेरियन कैलेंडर कहा जाता है,में पहले केवल10 महीनों के वर्ष की व्यवस्था थी।जिसे जूलियस सीजर,अगस्तस सीजर तथा ऑक्टेवियस सीजर ने बाद में 365 दिनों का करते हुए फरवरी को अन्य महीनों से बिल्कुल ही अलग कर दिया।अंग्रेजी कैलेंडर  विक्रम संवत से 57 वर्ष बाद और इसके 78 वर्ष बाद शक संवत भी अस्तित्व में आया था।दुर्भाग्य से संपूर्ण भारत और सनातनी लोग विक्रम संवत के आधार पर सभी प्रकार के उत्सवों,मांगलिक कार्यों और उद्यापनों को करते हैं जबकि आक्रांताओं के नाम पर जारी शक संवत भारत सरकार का सरकारी वर्ष आज भी बना हुआ है।विक्रम संवत को नेपाल का सरकारी कैलेंडर का दर्जा प्राप्त है।हिजरी संवत,बौद्ध संवत आदि कैलेंडर विक्रम संवत के बहुत बाद और इस जैसे सटीक गणनाओं पर आधारित नहीं है।

  विक्रम संवत का आरंभ भारतीय नववर्ष के रूप में चैत्र प्रतिपदा के दिन होने का एक कारण यह भी है कि सूर्य ,चन्द्र और पृथ्वी अपनी अपनी गतियों के कारण प्रतिवर्ष 22,मार्च को इस स्थिति में होते हैं,जिससे दिन और रात दोनों समान होती हैं।इसके सात दिनों के पश्चात ये सभी पुनः नवीन परिक्रमण शुरू करते हैं।इसी को सप्ताह कहा गया है।यही कारण है कि भारतीय नववर्ष का आरंभ बिल्कुल सटीक खगोलीय गणनाओं का दस्तावेज है,अभिलेख है।इसी दिन से वासंतिक नवरात्र की शुरुआत होती है।प्रकृति में सुकुमार कोमल पत्र पेड़ पौधों को नवीन कलेवर देते हुए मानो ऋतुराज का अभिनंदन करते हैं।कृषक वर्ग,विद्यार्थियों का समूह और अन्यान्य सभी लोग इस ऋतु में जनवरी की अपेक्षा अत्यंत मनोहर और रमणीक वातावरण में अपने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सर्वप्रथम मातृशक्ति की आराधना करते हैं।

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