@ विद्यावाचस्पति उदयराज मिश्र
अम्बेडकर नगर। किसी भी माध्यम से सीखे गए ज्ञान,कौशल और योग्यताओं की जांच का सबसे प्रभावशाली माध्यम परीक्षाएं होती हैं।ये अनौपचारिक और औपचारिक दोनों ही अभिकरणों द्वारा सम्पन्न हो सकती हैं किंतु बोर्ड परीक्षाओं का समय आते ही देश की शिक्षा व्यवस्था एक अदृश्य आपातकाल में प्रवेश कर जाती है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति जैसे बोर्डों की परीक्षाएँ केवल विद्यार्थियों की नहीं, शिक्षकों की भी परीक्षा बन जाती हैं। फर्क इतना है कि छात्र प्रश्नपत्र से जूझता है और शिक्षक प्रशासनिक चाबुक से।
स्थिति कितनी हास्यास्पद है कि विद्यालयों में प्रवेश,शिक्षण और वर्षभर विद्यार्थियों के कल्याण हेतु संचालित विभिन्न योजनाओं के संचालन हेतु न तो शिक्षा विभाग जागता है और न सरकार या प्रशासन ही।किंतु जैसे ही परीक्षाओं की तिथियों की घोषणा होती है,उसी के साथ ही परीक्षा तिथि घोषित होते ही विद्यालयों में आदेशों की झड़ी लगती है—सीसीटीवी अनिवार्य, प्रश्नपत्र की बहुस्तरीय सुरक्षा, बायोमेट्रिक उपस्थिति, निरीक्षण दलों की आकस्मिक छापेमारी। कागज़ पर यह सब पारदर्शिता के उपाय हैं, परंतु व्यवहार में यह शिक्षकों के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत बन जाते हैं।
शिक्षकों के तनाव और उनकी मनोदशाओं का अध्ययन वैसे तो मनोवैज्ञानिकों के लिए विषयवस्तु है किंतु जरा-सी तकनीकी त्रुटि होने पर भी भयंकर दंड की व्यवस्था, प्रश्नपत्र खोलने में समयांतर,उपस्थिति पत्रक में भूल, मूल्यांकन में अंक-प्रविष्टि की त्रुटि—और तुरंत कारण बताओ नोटिस के साथ ही अंतिम दंडात्मक आदेश। कई बार वेतन रोकने या निलंबन की चेतावनी तक की घटनाएं अब तो आम हो चुकी हैं।जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो शिक्षक शिक्षा कर्मी नहीं, संभावित अपराधी हो।
बोर्ड परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन हेतु बनाए जाने वाले केंद्र जिन्हें कि वास्तव में तपस्या केंद्र होना चाहिए था किंतु अब ये दंडशाला बनकर रह गए हैं।?मूल्यांकन केंद्रों पर प्रतिदिन सैकड़ों उत्तरपुस्तिकाएँ जाँचना, वह भी निर्धारित समयसीमा में, मानसिक और शारीरिक श्रम की चरम सीमा है। लक्ष्य पूरा न हो तो स्पष्टीकरण, त्रुटि हो जाए तो प्रतिकूल टिप्पणी।
ऐसे में यह यक्ष प्रश्न उठता है कि क्या किसी अधिकारी ने लगातार छह-सात घंटे कॉपियाँ जाँचने का अनुभव किया है? मानवीय भूल की संभावना को शून्य मान लेना ही सबसे बड़ी प्रशासनिक भूल है। त्रुटि को सुधार का अवसर मानने की बजाय दंड का आधार बना देना शिक्षकीय गरिमा पर प्रहार है।देश का कोई भी ऐसा अधिकारी या कर्मचारी नहीं है जिससे त्रुटि न हुई हो।किंतु सामान्य त्रुटियों हेतु भी माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा हंटर चलाने से शिक्षकों की मनःस्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सरकारी अधिकारी तो रुआब और लब्बोलुआब से चलते हां किंतु सरकार का दायित्व है कि नीति में संवेदना हो तथा शिक्षकों के मान और स्वाभिमान के खिलाफ निरंतर होने वाले प्रहारों को रोका जाए।शिक्षकों का चयन, प्रोन्नत, ऋण आदि कोई भी कार्य जो अधिकारी बिना घुस लिए पारित नहीं करता वही परीक्षाओं में शिक्षकों को हुनर सिखाता है,यह स्थिति वास्तव में चिंतनीय है।अतएव सरकार को स्मरण होना चाहिए कि सरकार केवल आदेश जारी करने वाली सत्ता नहीं, बल्कि शिक्षा की संरक्षिका है।शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों के बोझ से मुक्त रखना उसका दायित्व है।परीक्षा काल में संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है।दंडात्मक संस्कृति की बजाय सहयोगात्मक वातावरण बनाना उसका नैतिक कर्तव्य है।यदि नीति में संवेदना नहीं होगी, तो व्यवस्था में कठोरता ही बचेगी।
परीक्षाओं के मद्देनजर अधिकारियों का दायित्व और भी गुरूतर है।उन्हें स्वयं को निरीक्षक नहीं बल्कि मार्गदर्शक समझना चाहिए।उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि
ज़िलास्तरीय और मंडलीय अधिकारी परीक्षा प्रबंधन के संयोजक हैं। किंतु जब संयोजन की जगह नियंत्रण प्रमुख हो जाए, तो संबंध सहयोगी नहीं, अधीनस्थ बन जाता है।सार्वजनिक फटकार, कठोर भाषा और भय पैदा करने वाली बैठकों से व्यवस्था नहीं सुधरती; केवल अविश्वास बढ़ता है।अधिकारी यदि शिक्षक को साझेदार मानें, तो परीक्षा की शुचिता स्वतः सुनिश्चित होगी। भय से केवल औपचारिक अनुशासन मिलता है, वास्तविक गुणवत्ता नहीं।
अभिभावकों की भी भूमिका शिक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।जो अभिभावक वर्षभर अपने पाल्यो को प्रदेश भेजकर कमाई करवाते हैं,पढ़ने नहीं भेजते हैं और कि शिक्षकों की सिफारिश करके शुल्क आदि जमाकरके नाम रजिस्टर पर चलवाते हैं,वही अभिभावक परीक्षा आने पर प्रवेशपत्र रुकने पर,प्रोजेक्ट न आ होने पर सारा फिश शिक्षकों के सिर मढ़ देते हैं और अधिकारी भी व्यापक बाल हित की बातें करके शिक्षकों को ही दोषी मानते हैं।इतना ही नहीं
परिणाम घोषित होते ही अनेक अभिभावक शिक्षक को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।भले ही बच्चे सालभर कक्षाओं से पलायन करें किंतु परीक्षा में कम अंक आनेपर दोष शिक्षक का और अनुशासनहीनता होने पर दोष विद्यालय का।गौरतलब है कि घर का अध्ययन वातावरण, मोबाइल का अनियंत्रित उपयोग, सामाजिक दबाव—इन सबकी समीक्षा कम ही होती है। शिक्षक पर सार्वजनिक टिप्पणी और अपमान बच्चों के मन में भी अनादर का संस्कार भर देता है। यह शिक्षा के मूल भाव को नष्ट करता है।
चाबुक की संस्कृति का परिणाम शिक्षा जगत के लिए अत्यंत भयावह है।जब शिक्षक स्वयं भयभीत होगा, तो वह विद्यार्थियों में आत्मबल कैसे भरेगा?
जब हर क्षण निरीक्षण और दंड का डर रहेगा, तो शिक्षा सृजनात्मक कैसे बनेगी?राष्ट्र निर्माण की आधारशिला शिक्षक है। यदि उसी पर अविश्वास का चाबुक चलेगा, तो भविष्य की इमारत डगमगाएगी। परीक्षा की शुचिता आवश्यक है, परंतु शुचिता का मार्ग अपमान और आतंक से नहीं, विश्वास और सहयोग से प्रशस्त होता है।
इस निमित्त समाधान का सबसे सम्मान जनक रूप यह है कि परीक्षा प्रबंधन में स्पष्ट दिशा-निर्देश और पूर्व प्रशिक्षण।पहली त्रुटि पर दंड नहीं, परामर्श।कार्यभार और समयसीमा का युक्तिसंगत निर्धारण।अभिभावक-विद्यालय संवाद की सुदृढ़ व्यवस्था।
शिक्षकों पर चलते चाबुक का यह दृश्य शिक्षा व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं। सरकार नीति से, अधिकारी व्यवहार से और अभिभावक संस्कार से यदि शिक्षक को सम्मान देंगे, तभी शिक्षा का वातावरण स्वस्थ होगा।अनुशासन आवश्यक है, परंतु अनुशासन और अपमान में सूक्ष्म अंतर है।यदि यह अंतर नहीं समझा गया, तो बोर्ड परीक्षाएँ केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी भय का पर्याय बनी रहेंगी।