Saturday, March 7, 2026
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व्यक्तित्व विकास की स्वीकार्यता ही सुधार की दिशा में पहला कदम

अयोध्या। जिला अस्पताल के मनोपरामर्शदाता डा आलोक मनदर्शन का कहना है कि व्यक्तित्व-विकार या पर्सनालिटी-डिसऑर्डर वे मानसिक प्रक्रियायें है, जो व्यक्ति के व्यवहारिक़ जीवन में न केवल अवरोध उत्पन्न करती हैं, बल्कि आगे चलकर गंभीर मनोरुग्णता का कारण बनती है। दस प्रमुख व्यक्तित्व-विकार या पर्सनालिटी-डिसऑर्डर के झक्की या आड, बनावटी या ड्रामैटिक व चिंतालु या ऐंक्शस नाम के तीन मुख्य वर्ग होते हैं। झक्की-वर्ग में अकेलापन-भ्रमी, अनोखा पन-भ्रमी व शक-भ्रमी आते हैं। बनावटी-वर्ग में असामाजिक, आत्ममुग्ध, ध्यानाकर्षण व व्याकुल व्यक्तित्व-विकार ग्रसित आते हैं। पलायनवादी, आश्रितवादी व मनोबाध्यता व्यक्तित्व- विकार चिंतालु-वर्ग में आते हैं ।
उक्त बातें उन्होंने विश्व सीज़ोफ्रीनिया-जागरूकता दिवस पर एक स्कूल में आयोजित मेंटल हेल्थ टाक शो के दौरान दिया। उन्होंने बताया कि एंटीसोशल व नार्सिसिस्टिक या दंभी व्यक्तिव-विकार के लोग दम्भी व संवेदनहींन होते हैं । चिंतालु-वर्ग के लोग बेवजह चिंतित व परेशान रहते हैं तथा शंकालु वर्ग के व्यक्ति विश्वासघात की आशंका में समाज से दूरी बनाते है। इस प्रकार पर्सनालिटी-डिसऑर्डर अवसाद, उन्माद, एंगजाइटी-डिसऑर्डर, सीज़ोफ्रीनिया मनोरोग का आधार बनते हैं ।
उन्होंने बताया कि व्यक्तित्व- विकार की स्वीकार्यता ही इस विकार के सुधार की दिशा में पहला कदम है। व्यक्तिव-विकार ग्रसित व्यक्ति में अंतदृष्टि की घोर कमी होती है, जबकि उसके पिंरजन व सहकर्मी उसके विकार से अवगत तो होते है, पर संकोच या डर के कारण चुप रहते हैं। व्यक्तित्व विकार ग्रसित के मनोरोगी बन जाने पर उसके अंतर्निहित व्यक्तित्व-विकार का निदान व व्यक्तित्व पुनर्निर्माण की कॉग्निटिव बेहैवियर थेरैपी जरूरी होती है । ं

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