@ विनोद तिवारी
अयोध्या। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने रामदाना (राजगीरा) की फसल पर संगठित शोध कार्य प्रारंभ कर दिया है। विश्वविद्यालय के बीज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सह प्राध्यापक डॉ. विक्रमजीत सिंह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की समन्वित परियोजना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत संचालित कोऑर्डिनेटेड रिसर्च नेटवर्क ऑन पोटेंशियल क्रॉप्स के तहत रामदाना की उन्नतशील किस्मों के विकास पर कार्य कर रहे हैं। डॉ. सिंह ने बताया कि रामदाना की खेती न्यूनतम संसाधनों और सामान्य परिस्थितियों में भी आसानी से की जा सकती है। मध्य भारत में इसका प्रचलन फलाहार के रूप में व्यापक है। ऐसे में किसानों के लिए यह फसल अतिरिक्त आय का सशक्त माध्यम बन सकती है।
उन्होंने कहा कि अयोध्या धाम के विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिदिन बढ़ रहे श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों की संख्या को देखते हुए प्रसादी के रूप में रामदाना उत्पादों की बड़ी खपत की संभावना है। इस दृष्टिकोण से पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसकी खेती के व्यापक अवसर बन रहे हैं।
180 जर्मप्लाज्म एकत्रित, प्रक्षेत्र पर परीक्षण शुरू
डॉ. सिंह के अनुसार अब तक रामदाना के 180 जनन-द्रव्य (जर्मप्लाज्म) एकत्रित किए जा चुके हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय के प्रक्षेत्र पर पंक्तिवार बोया गया है। देशभर से संकलित जर्मप्लाज्म राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो तथा बेंगलुरु स्थित केंद्रों से प्राप्त किया गया है। प्रारंभिक अवलोकन में गुजरात, जोधपुर और बेंगलुरु की स्थानीय प्रजातियों का प्रदर्शन बेहतर पाया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी तक विश्वविद्यालय से रामदाना की कोई प्रजाति अधिसूचित (रिलीज) नहीं हुई है। वर्तमान शोध का परिणाम वर्ष 2028 तक आने की संभावना है, जिसके अंतर्गत उच्च उत्पादन क्षमता वाली उन्नत किस्म विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
डॉ. विक्रमजीत सिंह रामदाना के साथ-साथ किनोवा, बाकला, विंडबीज तथा कंकुड़ा फसलों की उन्नत किस्मों के विकास पर भी कार्य कर रहे हैं। डॉ विक्रमजीत सिंह का मानना है कि इन वैकल्पिक फसलों के माध्यम से क्षेत्रीय किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।