अयोध्या। विश्व नशारोधी दिवस (26 जून) की पूर्व संध्या पर जिला चिकित्सालय के मन कक्ष में आयोजित कार्यशाला में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आलोक मनदर्शन ने कहा कि नशे की समस्या तेजी से जटिल रूप ले रही है और अब इसकी चपेट में युवकों के साथ-साथ लड़कियां भी बड़ी संख्या में आ रही हैं। उन्होंने कहा कि नशे की लत अक्सर पारंपरिक नशों से शुरू होकर ओपिआयड पदार्थों, नशीली गोलियों, सिरप और इंजेक्शन तक पहुंच जाती है।
डॉ. मनदर्शन ने बताया कि नशीले पदार्थों के सेवन से मस्तिष्क में डोपामिन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे व्यक्ति को आनंद और उत्साह का अनुभव होता है। समय के साथ शरीर इस स्थिति का अभ्यस्त हो जाता है और नशे की लगातार बढ़ती आवश्यकता महसूस होने लगती है। इसे ड्रग डिपेंडेंस और ड्रग टॉलरेंस कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि मानसिक तनाव, पारिवारिक पृष्ठभूमि और मित्रों का प्रभाव नशे की लत के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। एक अध्ययन के अनुसार दो-तिहाई नशा करने वालों में इसकी शुरुआत किशोरावस्था में ही हो जाती है। नशीले इंजेक्शन का उपयोग करने वाले लोगों में एक ही सिरिंज का कई लोगों द्वारा इस्तेमाल और असुरक्षित यौन संबंध एचआईवी समेत अन्य यौन जनित संक्रमणों का खतरा बढ़ा देते हैं।
कार्यशाला में बताया गया कि देश में 7.1 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की नशे की लत से प्रभावित हैं। एम्स, नई दिल्ली के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर के अनुसार 57.4 लाख से अधिक महिलाएं और लड़कियां भी नशे की समस्या से जूझ रही हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि पब कल्चर, रेव पार्टियां, आधुनिक जीवनशैली का दबाव, मानसिक तनाव और साथियों का प्रभाव युवाओं को नशे की ओर आकर्षित कर रहा है।
डॉ. मनदर्शन ने बताया कि जिला चिकित्सालय में संचालित ओपिआयड सब्सटीट्यूशन थेरेपी (ओएसटी) केंद्र पर नशीले इंजेक्शन के आदी लोगों को दवाओं और परामर्श के माध्यम से नशा छोड़ने में मदद दी जा रही है। इस केंद्र से अब तक 150 से अधिक किशोर और युवा लाभान्वित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि परिवार का सहयोग, मैत्रीपूर्ण व्यवहार, सतर्कता और समय पर मनोवैज्ञानिक परामर्श नशे की रोकथाम और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।