Friday, June 19, 2026
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यात्रा वृतांत: भाग दो – दुधवा की दहलीज पर: शारदा के तट से तराई के रहस्यमयी जंगलों तक


तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध मेंढक मंदिर ने कराई आध्यात्मिक अनुभूति


✍️ मुकेश पांडे की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


बहराइच जनपद की सीमा पार करते ही हमारी यात्रा ने एक नया रंग लेना शुरू कर दिया। बहराइच से लखीमपुर खीरी जिले की सीमा पर घाघरा नदी पर बने जालिमनगर पुल पर पहुँचते-पहुँचते दूर तक फैली विशाल शारदा नदी के दर्शन हुए। वर्षा ऋतु की आहट के बीच उफनती जलधारा और उसके किनारों पर फैली हरियाली ने मन को रोमांच से भर दिया। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति स्वयं आगे आने वाले अनुभवों की भूमिका तैयार कर रही हो।

इसी दौरान मैंने अपने मित्र डीआरडीए के परियोजना निदेशक सतीश पांडे जी को फोन कर बहराइच पार करने की सूचना दी। विलंब से सूचना देने का उलाहना देने के बाद उन्होंने बताया कि आपको एलआरपी गेस्ट हाउस पहुँचने में अभी लगभग एक घंटा लगेगा और तब तक वह वहीं पहुंच कर मेरा इंतजार करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि संदीप तिवारी और सर्वेश तिवारी भी वहीं आकर मुलाकात करेंगे। संदीप जी से बात करने पर उन्होंने भी सहमति जताई और तय हुआ कि सभी लोग एलआरपी गेस्ट हाउस में मिलेंगे।

दोपहर लगभग एक बजे हम एलआरपी गेस्ट हाउस पहुँचे। वहाँ पहुँचने से पहले मैंने अपने पुराने पत्रकार साथी और दैनिक जागरण बहराइच में वर्षों तक साथ काम कर चुके शिवकुमार गौड़ जी को फोन किया। वर्तमान में वे अमर उजाला लखीमपुर खीरी ब्यूरो में संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं। आत्मीयता का आलम यह था कि सूचना मिलते ही वे 15–20 मिनट के भीतर गेस्ट हाउस पहुँच गए। वहाँ सतीश पांडे जी पहले से प्रतीक्षा कर रहे थे और कुछ ही देर में संदीप तिवारी भी आ पहुँचे। लगभग डेढ़ -दो वर्ष बाद हुई इस मुलाकात में पुरानी यादें, पत्रकारिता के अनुभव और क्षेत्रीय चर्चाएँ देर तक चलती रहीं। साथ बैठकर भोजन करने का आनंद इस मिलन को और भी यादगार बना गया।


ओयल का अद्भुत मेंढक मंदिर: तंत्र, वास्तुकला और आस्था का अनोखा संगम


  भोजन के दौरान शिवकुमार गौड़ जी ने एक ऐसे मंदिर का उल्लेख किया जिसने हमारी जिज्ञासा बढ़ा दी। उन्होंने बताया कि सीतापुर मार्ग पर स्थित ओयल का प्रसिद्ध मेंढक मंदिर अपनी अनूठी बनावट और तांत्रिक महत्व के कारण देशभर में जाना जाता है। यह सुनते ही हमने तत्काल वहाँ जाने का निर्णय लिया।

करीब बीस मिनट की यात्रा के बाद हम मंदिर परिसर पहुँचे। पहली ही दृष्टि में इसकी संरचना मन को आकर्षित कर लेती है। मंदिर का आधार विशाल मेंढक के आकार का बनाया गया है और संपूर्ण स्थापत्य में इस आकृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। माना जाता है कि 19वीं शताब्दी में ओयल रियासत के शासक राजाबख्श सिंह ने इसका निर्माण कराया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसकी योजना तांत्रिक सिद्धांतों से प्रेरित थी और इसे विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।


मंदिर में भगवान शिव का प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। हमने विधिवत पूजन, जलाभिषेक और दर्शन किए। परिसर का शांत वातावरण, घंटियों की ध्वनि और श्रद्धालुओं की आस्था मन को गहरे तक स्पर्श कर रही थी। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा से यहाँ की गई प्रार्थना मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। स्थापत्य की दृष्टि से भी यह मंदिर भारत के विरले मंदिरों में गिना जाता है, जहाँ धार्मिक प्रतीकवाद और कलात्मक कल्पना का अद्भुत मेल दिखाई देता है। मंदिर से सटा हुआ कूप आज भी स्वच्छ जल का स्रोत बना हुआ है, यह देखना भी आनंददायक यहां। यहां बातचीत के दौरान पता चला कि राज्य सरकार जल्द ही इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराने वाली है। यह जानकर दीपक भाई ने अतिशय प्रसन्नता जताई। दर्शन के उपरांत हम पुनः एलआरपी गेस्ट हाउस लौटे, जहाँ सर्वेश तिवारी जी से भेंट हुई। कुछ देर चर्चा के बाद शिवकुमार गौड़ जी से विदा ली और फिर हमारी यात्रा का अगला तथा सबसे रोमांचक पड़ाव दुधवा की ओर प्रस्थान आरंभ हुआ।


तराई की हरियाली और जंगल का पहला आमंत्रण


 दुधवा वन्य जीव प्रभाग की ओर बढ़ता हुआ रास्ता मानो प्रकृति की खुली पाठशाला बन गया था। जगह-जगह छोटी-बड़ी नदियाँ, बरसाती नाले, खेतों के बीच लहराती हरियाली और दूर तक फैले वृक्षों के समूह यात्रा को अत्यंत सुखद बना रहे थे। तराई क्षेत्र की मिट्टी की सोंधी महक, आर्द्र हवा और पक्षियों की आवाजें यह एहसास करा रही थीं कि हम धीरे-धीरे उस भूभाग में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ मनुष्य से अधिक अधिकार प्रकृति का है।

शाम लगभग पाँच बजे हम पलिया रेलवे स्टेशन के निकट पहुँच चुके थे। रास्ते में दिखाई देने वाली संकरी लूप रेल लाइन ने हमारा विशेष ध्यान आकर्षित किया। आज के आधुनिक रेल नेटवर्क में ऐसी लाइनें बहुत कम बची हैं और नानपारा से मैलानी खंड उनमें प्रमुख है। मेरे साथ यात्रा कर रहे दीपक शुक्ल जी के लिए यह दृश्य बिल्कुल नया था। वे आश्चर्य से बार-बार उस रेलपथ को देखते रहे और उसकी संरचना तथा इतिहास के बारे में प्रश्न पूछते रहे। अगले दिन इसी मार्ग से गुजरती ट्रेन को देखने का अनुभव भी हमारे लिए यादगार बना।

पलिया कस्बे में हमारे ठहरने की व्यवस्था सर्वेश तिवारी जी ने स्थानीय स्लीप इन होटल में कराई थी। रेलवे स्टेशन और बस अड्डे के निकट स्थित यह होटल यात्रियों के लिए सुविधाजनक और व्यवस्थित प्रतीत हुआ। कुछ समय विश्राम करने के बाद सर्वेश जी ने हमारे मार्गदर्शन के लिए नंदलाल जी को भेजा, जो इस क्षेत्र की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों से भली-भाँति परिचित थे।

नंदलाल जी को लेकर दीपक जी के साथ संध्या लगभग छह बजे हम दुधवा क्षेत्र की ओर निकल पड़े। रास्ते में सुहेली नदी के दर्शन हुए। शांत बहती नदी पर पड़ती ढलते सूरज की सुनहरी किरणें ऐसा दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। नदी के किनारे फैली हरियाली, दूर तक फैले घास के मैदान और बीच-बीच में दिखाई देने वाले जलपक्षी वातावरण को और भी मनमोहक बना रहे थे।

वन क्षेत्र में पहुँचते ही प्रकृति का स्वरूप बदलने लगा। सड़क के दोनों ओर घने साल, सागौन, शीशम और मिश्रित प्रजातियों के वृक्ष एक प्राकृतिक सुरंग का आभास दे रहे थे। कहीं-कहीं ऊँची घास हवा के झोंकों के साथ लहरा रही थी तो कहीं बंदरों के झुंड डालियों पर उछल-कूद करते दिखाई दे रहे थे। पक्षियों की विविध आवाजें वातावरण में संगीत घोल रही थीं। जंगल की निस्तब्धता के बीच इन ध्वनियों का अलग ही आकर्षण था।

दूर तक फैली हरियाली के बीच चलते हुए ऐसा महसूस हो रहा था मानो हम किसी चित्रकार की बनाई जीवंत पेंटिंग के भीतर प्रवेश कर चुके हों। सड़क पर वाहनों की आवाजाही कम थी, जिससे जंगल की स्वाभाविक शांति बनी हुई थी, लेकिन मुख्य मार्ग पर बीच-बीच में गुजरते ट्रैक्टर व भारी वाहनों के शोर केवल हमारा ही नहीं पशु पक्षियों का भी आनंद भंग कर रहे थे।

हमने जंगल का एक प्रारंभिक चक्कर लगाया। यद्यपि उस समय कोई बड़ा वन्यजीव सामने नहीं आया, लेकिन प्रकृति का मौन सौंदर्य ही अपने आप में अत्यंत प्रभावशाली था। पेड़ों के बीच छनकर आती सूर्यास्त की अंतिम किरणें, झाड़ियों में होती हलचल, पक्षियों का अपने बसेरों की ओर लौटना और दूर कहीं सुनाई देती वन्यजीवों की आवाजें यह संकेत दे रही थीं कि रात के साथ जंगल का जीवन और अधिक सक्रिय होने वाला है।

कुछ समय प्रकृति के इस अद्भुत संसार में बिताने के बाद हम वापस लौट पड़े। यह तो केवल दुधवा के विशाल वन क्षेत्र की पहली झलक थी, लेकिन इस छोटी-सी यात्रा ने ही मन में उत्सुकता भर दी थी कि अगले दिन जंगल हमें और कितने अनदेखे, अनसुने और रोमांचकारी अनुभव देने वाला है। शारदा नदी से शुरू हुई यह यात्रा अब तराई के घने जंगलों की दहलीज पर पहुँच चुकी थी, जहाँ हर मोड़ पर प्रकृति का एक नया रहस्य हमारा इंतजार कर रहा था।

 


यात्रा वृतांत:भाग एक
पूर्णागिरी की ओर अविस्मरणीय यात्रा में सरयू के दिव्य दर्शन


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