Sunday, June 21, 2026
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यात्रा वृतांत- भाग : चार – दुधवा से पूर्णागिरि तक: जंगलों की हरियाली से आस्था की ऊँचाइयों तक


✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


दुधवा की मनमोहक स्मृतियों को मन में संजोए हुए सुबह लगभग 10 बजे हम दोनों मित्र पलिया स्थित स्लीप इन होटल से अपनी अगली मंजिल के लिए रवाना हुए। वाहन जैसे-जैसे दुधवा के कम सघन क्षेत्र से होते हुए आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे चारों ओर फैली हरियाली यात्रा को और भी आनंदमय बनाती गई। आगे बढ़ते समय शाहजहांपुर जनपद का हिस्सा पार करने के बाद हम पीलीभीत की सीमा में प्रवेश कर गए। इस भी एक जगह सड़क के किनारे खेतों से ताजा तोड़े गए खीरे खरीदें और उसकी ताजगी का स्वाद लिया। रास्ते में शारदा नहर का कलकल करता निर्मल प्रवाह दूर तक हमारा साथी बना रहा। लालकुआँ ब्रिज के समीप रुककर हमने बहते जल की मधुर ध्वनि का आनंद लिया, कुछ तस्वीरें खिंचवाईं और उस पल को अपनी स्मृतियों में कैद कर लिया।


पुराने मित्र की आत्मीयता


पीलीभीत पहुँचते ही मुझे अपने पुराने परिचित मनीष सिंह जी की याद आई। फोन मिलाया तो उन्होंने तुरंत बात की। उन्होंने बताया कि वे आवश्यक कार्य से नैनीताल गए हुए हैं, लेकिन यह जानकर कि मैं पीलीभीत टाइगर रिजर्व में हूँ, उन्होंने अपने कार्यालय पहुंचने पर ठहरने और भ्रमण की पूरी व्यवस्था कराने का प्रस्ताव रखा। उनकी सहजता और आत्मीयता ने मन को छू लिया।

चूँकि दुधवा के जंगलों का विस्तृत भ्रमण हम पहले ही कर चुके थे, इसलिए इस बार पीलीभीत में बाघ देखने की उत्सुकता को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा। हमने निश्चय किया कि अगली बार केवल पीलीभीत टाइगर रिजर्व को समर्पित यात्रा करेंगे। इसके बाद हम दूरभाष पर मनीष जी को प्रणाम कर आगे बढ़ चले।


शारदा नहर के साथ-साथ


शारदा नहर के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हुए कई स्थानों पर निर्माण कार्य और वैकल्पिक मार्गों के कारण रास्ता बदलना पड़ा। इस तरह हम लगभग एक घंटे बाद उत्तराखंड राज्य के उधमसिंह नगर जनपद में प्रवेश कर गए। मैदानी भूभाग धीरे-धीरे पहाड़ी परिवेश में बदलने लगा और मौसम में भी सुखद परिवर्तन महसूस होने लगा।


चाय की प्याली और पहाड़ों की आहट


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह क्षेत्र की नगर पंचायत खटीमा में हमने थोड़ी देर विश्राम किया। चाय की चुस्कियों के साथ स्थानीय लोगों से बातचीत की और पहाड़ी संस्कृति की सहजता का अनुभव प्राप्त किया। इसके बाद हमारा सफर टनकपुर की ओर बढ़ चला।


टनकपुर में छोटा विश्राम



लगभग दोपहर डेढ़ बजे हम टनकपुर पहुँचे। थोड़ी खोजबीन के बाद पहले से आरक्षित होटल पवित्र पैलेस मिल गया। सामान रखकर कुछ देर आराम किया और फिर आपसे बातचीत में हमने निर्णय लिया कि समय का सदुपयोग करते हुए उसी दिन मां पूर्णागिरि के दर्शन के लिए चढ़ाई की जाएगी।


चंपावत की ओर रोमांचक सफर



स्नान और चाय के बाद हम चंपावत की दिशा में निकल पड़े। घुमावदार सड़कें, गहरी घाटियाँ, ऊँचे पर्वत और घने जंगल हर मोड़ पर नया दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। कई स्थानों पर वाहन रोककर हमने प्राकृतिक सौंदर्य का भरपूर आनंद लिया

करीब 10 किलोमीटर आगे बढ़ने पर पर्वतीय चढ़ाई शुरू हो गई। संयोग से उस समय मेले का आयोजन भी चल रहा था। बड़ी संख्या में श्रद्धालु जयकारों के साथ मां पूर्णागिरि के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे थे। पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का अनोखा वातावरण था।


पैदल यात्रा का आरंभ


लगभग 20 किलोमीटर से अधिक सफर के बाद हमारा वाहन मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुँच गया। पार्किंग में वाहन खड़ा कर हमने पैदल चढ़ाई शुरू की। सामने ऊँचाई की ओर जाती सीढ़ियाँ और सँकरे रास्ते थे, लेकिन मां के दर्शन की अभिलाषा ने हर कठिनाई को सहज बना दिया। आस्था की डगर पर जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती गई, वैसे-वैसे नीचे फैली घाटियों और दूर-दूर तक फैले पर्वतों का दृश्य और भी मनोहारी होता गया। प्रकृति और श्रद्धा का यह अद्भुत संगम मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था। थकान के स्थान पर उत्साह था और हर कदम के साथ यह विश्वास भी कि मां पूर्णागिरि का आशीर्वाद इस यात्रा को सफल और यादगार बना देगा।

इस प्रकार दुधवा की हरियाली से प्रारंभ हुई हमारी यात्रा धीरे-धीरे उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में प्रवेश कर आध्यात्मिक अनुभूति की ओर अग्रसर हो गई। जंगलों का सुकून, नदियों का संगीत, पहाड़ों का वैभव और मां पूर्णागिरि के दर्शन की लालसा इन सबने मिलकर इस सफर को जीवन की अविस्मरणीय यात्राओं में शामिल कर दिया।

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