संज्ञान व्यवहार मनोउपचार में सर्वप्रथम उन विचारों व भावनाओं का निरपेक्ष व सचेतन पहचान कराया जाता है, जो अर्धचेतन मन पे हावी होकर लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या जैसी वृत्ति बनकर अवसाद, उन्माद, शक वहम, डर, भय जैसे मनोविकार का रूप ले सकते हैं । ठीक यही युक्ति या साइकोथिरैपी श्रीकृष्ण द्वारा एक मनोविश्लेषक व मनोउपचारक के रूप में निष्पादित की गयी जिससे मनोद्वन्द ग्रसित अर्जुन के मन में स्वस्थ व सकारात्मक अंतर्दृष्टि का संचार हुआ । मनो चिकित्सा मे सम्यक अंतर्दृष्टि का बहुत ही अहम रोल होता है, क्योंकि सम्यक अंतर्दृष्टि के अभाव में रुग्ण मनोवृत्तियों से उपजे असामान्य व जीवन बाधक व्यवहार मे बदलाव लाना असंभव होता है। इस प्रकार आधुनिक संज्ञान व्यवहार मनोउपचार या कॉग्निटिव बिहेवियर थिरैपी – सीबीटी की आदि युक्ति श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिपादित की गयी जो कि गीताग्रंथ के श्लोक में परिलक्षित है।