अयोध्या। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज में बीज उत्पादन की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई जा रही है, इसका उदाहरण सामने आ गया है। विश्वविद्यालय में चल रही फाउंडेशन और ब्रीडर बीज परियोजना को लेकर कैग ऑडिट में गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
ऑडिट के दौरान यह सामने आया कि फाउंडेशन और ब्रीडर बीज उत्पादन से जुड़ी योजनाओं के कोई ठोस दस्तावेज विश्वविद्यालय प्रशासन ऑडिट टीम को उपलब्ध नहीं करा सका। यह स्थिति तब है, जब विश्वविद्यालय प्रबंधन बीज उत्पादन बढ़ने के बड़े-बड़े दावे करता रहा है।
विश्वविद्यालय में स्थापित तीन बीज विधायन (सीड प्रोसेसिंग) संयंत्रों में से उमरहर स्थित संयंत्र पिछले एक वर्ष से बंद पड़ा है। ऐसे में बीज उत्पादन और उसकी प्रोसेसिंग दोगुनी होने के दावे सवालों के घेरे में आ गए हैं।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विजेन्द्र सिंह ने 27 वें दीक्षांत समारोह में यह घोषणा की थी कि वर्ष 2019-20 की तुलना में बीज उत्पादन दो गुना हो चुका है। लेकिन जब बीज विधायन संयंत्र ही बंद हैं, तो उत्पादन और प्रसंस्करण में बढ़ोतरी कैसे हो रही है, यह स्पष्ट नहीं है।
इस पूरे मामले में जब विश्वविद्यालय के संयुक्त निदेशक (बीज एवं प्रक्षेत्र) डॉ. उमेश चंद्रा से उनके मोबाइल पर संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने बातचीत नहीं की। कार्यालय में संपर्क करने पर उन्होंने यह स्वीकार किया कि बीज उत्पादन, प्रसंस्करण और बिक्री से जुड़े आंकड़े उनके पास उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने यह जानकारी प्लांट मैनेजर से लेने की बात कही।
गौरतलब है कि विश्वविद्यालय के अंतर्गत बीज विधायन संयंत्र मसौधा, विश्वविद्यालय मुख्य परिसर और उमरहर समेत कुल तीन बीज विधायन संयंत्र स्थापित हैं, लेकिन इनके संचालन और उत्पादन को लेकर स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।
बीज उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में दस्तावेजों की कमी, संयंत्रों का बंद होना और जिम्मेदार अधिकारियों के पास आंकड़ों का न होना, विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।