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संकल्प से सफर तक भाग – 09 “पहाड़ों की रानी मसूरी की ओर बढ़े कदम…”

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◆ बादलों के बीच वन सम्पदा, पहाड़ियों एवं जल प्रपातों से साक्षात्कार


हरिद्वार में बिताया गया पिछला दिन आस्था और आध्यात्मिक अनुभूतियों से परिपूर्ण रहा। मां चंडी देवी और मां मनसा देवी के दर्शन तथा हर की पैड़ी की भव्य गंगा आरती ने मन को ऐसी शांति प्रदान की थी, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। … लेकिन हमारी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी। अगले दिन हमें उत्तराखंड की उस रमणीय धरती की ओर प्रस्थान करना था, जिसे पूरे देश में “पहाड़ों की रानी” मसूरी के नाम से जाना जाता है।



कार्यक्रम के अनुसार सभी साथियों को प्रातः छह बजे तक अपने-अपने कमरों से बाहर निकलकर होटल के हॉल में एकत्र होना था, ताकि समय से मसूरी के लिए प्रस्थान किया जा सके। यात्रा का उत्साह ऐसा था कि अधिकांश साथी छह बजने से पहले ही जाग चुके थे। कोई मोबाइल की बैटरी जांच रहा था, कोई वस्त्र समेट रहा था। भास्कर शुक्ल, मनोज श्रीवास्तव, सुबोध चतुर्वेदी, इंद्रजीत शुक्ल और विष्णु यादव साथियों को जल्दी तैयार होने की याद दिला रहे थे।



सुबह लगभग साढ़े छह बजे तक अधिकांश साथी होटल के भूतल पर पहुंच चुके थे। अब तक महापौर के साथ चल रहे विष्णु मौर्य की एक क्लिक ने लोगो के मन में यात्रा का रोमांच भर दिया। होटल प्रबंधन ने चाय और नाश्ते में गरमागरम छोला, पोहा व आम की व्यवस्था की थी। पहाड़ों की ओर लंबी यात्रा से पहले हल्का, लेकिन स्वादिष्ट नाश्ता चाय के साथ सभी के लिए उपलब्ध था। चाय की चुस्कियों के साथ अगले पड़ाव की चर्चा भी चल रही थी। कोई मसूरी के मौसम की बात कर रहा था तो कोई कैंपटी फॉल में स्नान की योजना बना रहा था।

नाश्ता समाप्त होते ही सभी अपने-अपने वाहनों में सवार हो गए। तीनों वाहन एक के पीछे एक खड़े थे। महापौर गिरीशपति त्रिपाठी जी तथा वशिष्ठ फाउंडेशन की महासचिव एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजलक्ष्मी तिवारी जी के नेतृत्व में ठीक सात बजे हमारा काफिला नीलकंठ होटल से मसूरी की ओर रवाना हो गया।

हम लोग महज  आठ-10 किलोमीटर गए होंगे कि धीरे-धीरे हरिद्वार नगर पीछे छूटन लगा और देहरादून की पर्वत श्रृंखलाएं हमारा स्वागत करने लगीं। कुछ ही समय बाद हम मुख्य मार्ग पर थे। जैसे-जैसे वाहन आगे बढ़ते गए, प्रकृति का स्वरूप बदलता गया। मैदानी रास्तों की जगह घुमावदार सड़कें दिखाई देने लगीं। सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली, ऊंचे-ऊंचे पेड़ और पहाड़ों से उतरते छोटे-छोटे जलस्रोत यात्रा को और भी मनोहारी बना रहे थे।

कहीं पानी चट्टानों से टकराकर मधुर संगीत उत्पन्न कर रहा था तो कहीं वह सड़क के किनारे बहते हुए अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था। ऐसे मनोरम दृश्यों को देखकर हमारे चालक भी स्वयं वाहन रोक देते और हम सभी कुछ देर प्रकृति का आनंद लेते। समूह के लगभग प्रत्येक सदस्य ने इन स्थानों पर स्मृति-चित्र और सेल्फियां लीं। आखिर यात्रा की यादें केवल मन में ही नहीं, कैमरे में भी सहेजनी थीं।



देहरादून पहुंचने से पहले एक स्थान पर तीनों वाहन फिर रुके। सभी साथी एक साथ एकत्र हुए। सभी ने  कुछ देर विश्राम किया और सामूहिक छायाचित्र भी लिए। यात्रा का सबसे सुंदर पक्ष यही था कि यहां कोई औपचारिकता नहीं थी। सभी एक परिवार की तरह साथ चल रहे थे। साथ हास- परिहास कर रहे थे और हर दृश्य का आनंद साझा कर रहे थे।

देहरादून पार करते ही मसूरी की वास्तविक चढ़ाई शुरू हो गई। अब सड़कें लगातार ऊपर उठ रही थीं। एक ओर ऊंचे पर्वत थे तो दूसरी ओर गहरी घाटियां। कहीं देवदार और चीड़ के घने वन दिखाई देते तो कहीं दूर-दूर तक फैली पहाड़ी बादलों की चादर ओढ़े खड़ी नजर आती।

इन्हीं मनोहारी दृश्यों के कारण मसूरी को वर्षों पहले अंग्रेजों ने “क्वीन ऑफ द हिल्स”, अर्थात पहाड़ों की रानी की उपाधि दी थी। वर्ष 1827 में ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन फ्रेडरिक यंग ने इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित होकर विकसित करना प्रारंभ किया और देखते ही देखते यह भारत के सबसे प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थलों में शामिल हो गया।



अब यात्रा का प्रत्येक मोड़ प्रकृति के नए रूप से परिचय करा रहा था। पर्वतों की गोद से उतरती असंख्य बरसाती जलधाराएँ हमारा स्वागत कर रही थी। इसी क्रम में सोंग नदी और सुसवा नदी के दर्शन हुए। शिवालिक पर्वतमाला से उद्गमित सोंग नदी वर्षा आधारित होने के बावजूद देहरादून घाटी की जीवनरेखा मानी जाती है। इसके दोनों तटों पर फैले सघन वन,  निर्मल जल और हरियाली पूरे क्षेत्र के पर्यावरण को समृद्ध बनाते हैं। यह नदी अंततः अपनी पावन धारा को माँ गंगा में समर्पित कर देती है।

कुछ दूरी पर शांत गति से बहती सुसवा नदी भी प्रकृति की अनुपम देन के रूप में दिखाई दी। इसका प्रवाह राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के मध्य से होकर गुजरता है। इसकी निर्मल धारा और दोनों ओर फैली हरियाली देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि प्रकृति स्वयं संगीत सुना रही हो। सोंग और सुसवा नदियाँ वास्तव में देहरादून घाटी की जीवनदायिनी धमनियाँ हैं।

जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई, प्रकृति के रंग भी बदलते गए। कई स्थानों पर ऐसा अद्भुत दृश्य दिखाई दिया जिसे देखकर सभी साथी रोमांचित हो उठे। बादलों का विशाल समूह हमारे नीचे था और हम पर्वत की ऊंचाइयों पर मौजूद थे। नीचे नीले सफेद बादलों का समुद्र और ऊपर नीला आकाश—ऐसा दृश्य जीवन में पहली बार देखने को मिला। उस क्षण ऐसा लग रहा था मानो हम धरती पर नहीं, बादलों के ऊपर चल रहे हों। यात्रा के दौरान सभी साथी अपने-अपने मोबाइल और कैमरों में इस अद्भुत दृश्य को कैद करते रहे। उस अलौकिक दृश्य को देखकर सभी साथी भाव-विभोर हो उठे। प्रकृति के इस विराट और दिव्य स्वरूप ने यात्रा को केवल मनोरम और  अविस्मरणीय बना दिया।

लगातार घुमावदार रास्तों और ऊंची चढ़ाई के कारण कुछ साथियों को हल्की घबराहट महसूस हुई और चक्कर आने की शिकायत हुई। हालाकिं पहाड़ी यात्रा में यह सामान्य बात है। सौभाग्य से हमारे वाहनों में प्राथमिक उपचार किट उपलब्ध थी। जरूरत के मुताबिक आवश्यक दवाएं दी गईं। कुछ देर विश्राम के बाद सभी सामान्य हो गए। महापौरजी स्वयं समय-समय पर प्रत्येक वाहन का हालचाल लेते रहे। उनके इस आत्मीय व्यवहार ने सभी साथियों का उत्साह बनाए रखा।

इसी मार्ग पर भगवान भोलेनाथ के प्रसिद्ध श्रीप्रकाशेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पहाड़ की चोटी पर मौजूद इस मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार, स्वच्छ एवं शांत परिसर, शिवभक्ति से गूँजता वातावरण मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था। हम सभी ने श्रद्धापूर्वक भगवान आशुतोष को नमन किया और पूरी यात्रा के सफल, सुरक्षित एवं मंगलमय संपन्न होने की प्रार्थना की। कुछ समय मंदिर परिसर की दिव्य अनुभूति अपने भीतर समेटने के बाद हम पुनः मसूरी की ओर चल पड़े।

करीब ढाई से तीन घंटे की मनोहारी यात्रा के बाद हमारा काफिला मसूरी के विश्वप्रसिद्ध कैंपटी फॉल पहुंच गया। दूर से ही पहाड़ों के बीच गिरती जलधारा की गर्जना सुनाई देने लगी थी। प्रकृति का यह अनुपम उपहार समुद्र तल से लगभग साढ़े चार हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। कहा जाता है कि अंग्रेजी शासनकाल में यहां ब्रिटिश अधिकारी चाय-पार्टियों (Camp Tea) का आयोजन किया करते थे। धीरे-धीरे ‘कैम्प-टी’ शब्द ही बदलकर कैंपटी बन गया और यह झरना पूरे देश में इसी नाम से प्रसिद्ध हो गया।

वाहन पार्क करने के बाद तय हुआ कि सभी साथी नीचे उतरकर झरने का आनंद लेंगे। महापौरजी ने भी इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की। सामने नीचे उतरती लंबी सीढ़ियां थीं। युवाओं ने उत्साह के साथ कदम बढ़ाए, जबकि वरिष्ठ साथी धीरे-धीरे सावधानी से उतरने लगे। नीचे से आती जलधारा की आवाज़ हमें लगातार अपनी ओर आकर्षित कर रही थी।

सीढ़ियां उतरते समय चारों ओर फैली प्राकृतिक हरियाली, चट्टानों के बीच से बहता पानी और पर्वतों की ठंडी हवा मन को बार-बार यही एहसास करा रही थी कि प्रकृति का वास्तविक वैभव केवल पहाड़ों में ही देखने को मिलता है। मैदानों में रहने वाले हमारे जैसे लोगों के लिए यह दृश्य किसी स्वप्न से कम नहीं था। कुछ ही देर बाद हम उस स्थान पर पहुंच गए, जहां बर्फ जैसी ठंडी जलधारा हमारा स्वागत करने के लिए व्याकुल प्रतीत हो रही थी। हम सभी ने कैंपटी फॉल में आनंद के तक़रीबन 30 मिनट बिताये। कैंपटी फॉल को जैसा सुना था और पत्र पत्रिकाओं में पढ़ा था, वैसा ही पाया।

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