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त्याग, तपस्या और बलिदान से मिली थी आजादी

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◆ जिसका साक्षी है, अगस्त महीना


◆ जंगे -ए- आजादी में बाराबंकी की भी रही भूमिका


दिलीप कुमार श्रीवास्तव, लेखक

देश का इतिहास वैसे तो त्याग, तपस्या और बलिदान से भरा पड़ा है अगस्त का महीना देश की आजादी में काफी महत्वपूर्ण व गौरवशाली माना जाता है।

आजादी का बिगुल 8 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान मुंबई में महात्मा गांधी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में ” अंग्रेजों भारत छोड़ो “का गांधी जी ने नारा बुलंद करते हुए देशवासियों से  करो या मरो का आह्वान किया था।

नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसके चलते अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तारियां शुरू कर दी। 9 अगस्त की सुबह ही अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, महादेव देसाई सहित कई स्वाधीनता सपूतों को गिरफ्तार कर पुणे के आगा खान पैलेस में रखा। महात्मा गांधी सहित तमाम स्वाधीनता सपूतों की गिरफ्तारी पूरे देश में आग की तरह फैल गई जगह-जगह अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे बुलंद होने लगे। उधर पटना बिहार में 11 अगस्त को आंदोलनकारी ने सचिवालय पर तिरंगा फहरा दिया जिससे बौखलाई फिरंगी सेना ने तत्कालीन जिलाधिकारी डब्लू जी आर्थर के आदेश पर आंदोलनकारियो पर फायरिंग कर दी जिसमें बिहार के सात आंदोलनकारी शहीद हो गए। इसी बीच जेल में कैद महादेव देसाई की मृत्यु 15 अगस्त को हो गई, स्वाधीनता के दीवाने देसाई की मृत्यु की सूचना आज की तरह पूरे देश में फैल गई जिसके चलते आंदोलनकारी ने अंग्रेजी हुकूमत के सरकारी कार्यालय, रेलवे स्टेशन, डाकघर को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। दूसरी ओर फिरंगियों ने आंदोलनकारी पर काबू पाने के लिए सेना की मदद ली। अंग्रेजों की सेना ने गांव के गांव जलने शुरू कर दिए तथा अनाजों के गोदाम पर कब्जा करके आम ग्रामीण पर अत्याचार व दमन शुरू कर दिया।

इसी बीच नेताजी सुभाष चंद्र बोस जो भूमिगत है वह ब्रिटिश हुकूमत की नाकेबंदी को तोड़ते हुए विदेश पहुंच गए और ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए, उन्होंने विदेश में ही इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया जिसे आजाद हिंद फौज भी कहा जाता है। साथ ही ” तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” नारा दिया। जो देश में काफी लोकप्रिय हुआ था।

हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त हुआ था। ऐसे में हर भारतीय के लिए 15 अगस्त गौरव का दिन है। हिंदुस्तान को आजाद कराने के लिए महात्मा गांधी, भगत सिंह, मंगल पांडे, लाला लाजपत राय, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई , सुखदेव, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल, उधम सिंह, मंगल पांडे, खुदीराम बोस, और अशफाक सहित हज़ारो स्वतंत्रता सेनानियों ने दशकों तक आजादी की लड़ाई लड़ी।


क्रांतिकारी आंदोलनो में सहभागी थे बाराबंकी वासी


भारत छोड़ो आंदोलन में बाराबंकी के कई क्रांतिकारियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिनमें से कुछ  वीर सपूतो मे रफ़ी अहमद किदवई, कुंवर दिग्विजय सिंह (केडी सिंह ‘बाबू’) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  शिव नारायण, रामचंदर, श्रीकृष्ण, श्रीराम, मक्का लाल, सर्वजीत सिंह, राम चंद्र, रामेश्वर, कामता प्रसाद, कल्लूदास, कालीचरण, बैजनाथ प्रसाद, राम गोपाल, राम किशुन सहित  तमाम लोग ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे और कुछ को जेल भी जाना पड़ा

1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में इस जिले के लोगों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे ब्रिटिश राज की रातों की नींद हराम हो गई। जिसके फलस्वरूप जिला कांग्रेस कार्यालय को सील कर दिया गया। परन्तु, स्थानीय नेताओं ने भूमिगत रहते हुये अपना विरोध जारी रखा। क्रांतिकारियों द्वारा विरोध प्रगट करने के लिये 24 अगस्त 1942 ई. को हैदरगढ़ डाकघर का लूट लिया गया था। इसी तरह की अन्य घटनाएं जीपीओ बाराबंकी और सतरिख में भी हुईं। सत्याग्रह के आह्वान पर इस जिले के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां दीं।

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