Saturday, March 7, 2026
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स्कंदमाता की आराधना से मृत्युलोक में शांति एवं परमसुख की होती है अनूभूति,खुल जाते हैं मोक्ष के द्वार


◆ चैत्र नवरात्र के पांचवें दिन स्कंदमाता के रूप में हुई पूजा तो छठवें दिन कथ्यानी माता के रूप में भक्त करेंगे स्तुति


@ सुभाष गुप्ता


बसखारी, अंबेडकर नगर। या देवी सर्वभूतेषु मां स्कंद रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।स्तुति मंत्र के साथ रविवार चैत्र नवरात्र के पांचवे दिन मां दुर्गा के वात्सल्य स्वरूप स्कंदमाता की पूजा आराधना भक्तों के घरों में स्थापित माता की चौकी एवं मातारानी के सभी मंदिरों में शुरू हुई।इस स्वरूप में मां दुर्गा अपनी गोद में पुत्र स्कंद को लिए चार भुजाओं के साथ सिंह पर विराजमान है। माता का यह स्वरूप शास्त्रों में असुरों के संहार के साथ-साथ वात्सल का प्रतीक बताया गया है। हिमालय की पुत्री माता पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस स्वरूप को स्कंद माता के रूप में जाना जाता है।जिसका पुष्कल महत्व के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। मां के इस स्वरूप की एकाग्र मन से साधना करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। स्कंदमाता की साधना के साथ बाल रूप में मां दुर्गा की गोद में विराजमान भगवान स्कन्द  की उपासना स्वमेव  हो जाती है। इनकी एकाग्र एवं पवित्र मन से की गई उपासना से सांसारिक मोह माया में रहते हुए भी भक्तों को मां दुर्गा की भक्ति के साथ भगवान स्कंद की भी भक्ति की प्राप्ति हो जाती है। माता के इस वात्सल्यपूर्ण की स्वरुप की साधना से भक्तों को मृत्यु लोक  में भी परम शांति और सुख का अनुभव प्राप्त होता है और मोक्ष का द्वार सुलभ हो जाता है। रविवार को पांचवें स्वरूप की पूजा आराधना के बाद भक्त नवरात्र के छठवें दिन सोमवार को मां नवदुर्गा के छठवें स्वरूप अमोघ फल दायिनी माता कात्यायनी की पूजा अर्चना करेंगे।

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