@ सुभाष गुप्ता
अंबेडकर नगर। होली का महा पर्व एक रिवाज या परंपरा ही नहीं बल्कि धर्म के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक संदेश देने का एक केंद्र बिंदु भी है।परंपराएं हमारी धार्मिक, सामाजिक व संस्कृतिक भावना की प्रतिमूर्ति होती है। आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं अंधविश्वास के नाम पर हम अपनी परंपराओं को भूलकर सामाजिक एवं भावनात्मक रूप से एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। पहले संयुक्त परिवार में बड़े बूढ़े लोगों से लोग परंपराओं के निर्वहन की कला सीख कर एक दूसरे का सहयोग करते हुए सभी पर्व एवं त्यौहारो को मनाते थे। लेकिन वर्तमान समय में एकल परिवार एवं अंधविश्वास के नाम पर हम अपनी परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। हिंदू धर्म का पवित्र त्यौहार होली भी इससे अछूता नहीं है। जबकि भारत देश में मनाए जाने वाले प्रत्येक त्योहारों का आध्यात्मिक,धार्मिक एवं वैज्ञानिक कारण भी है।होली उत्साह एवं उल्लास से परिपूर्ण एक ऐसा पारंपरिक त्यौहार है जो हंसी ठिठोली के बीच जीवन में मधुर मिठास एवं भाईचारे का संदेश देता है। यदि हम हिंदू धर्म के पवित्र त्यौहार होली की बात करें तो इसका धार्मिक ही नहीं आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विशेष महत्व है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से होली को लेकर शास्त्रों में वर्णित भक्त प्रहलाद, कृष्ण, राधा का अटूट प्रेम, कामदेव और शिव की कथा, ऋतु परिवर्तन आदि प्रसंग हमें बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम का प्रतीक, वासना पर प्रेम की विजय, होली पर्व से सर्दियों का अंत, जीवन में नए रंगों की खुशी और नव वर्ष के आगमन को दर्शाता है। तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होली पर्व पर किया जाने वाला होलिका दहन एवं रंग खेलने की परंपरा आलस्य और बैक्टीरिया को पनपने से रोक कर मनुष्य के शरीर एवं वातावरण को शुद्ध करता है। होली के एक दिन पहले बुकवा (सरसों को पीसकर तैयार किया हुआ लेपन) और सरसों के तेल का लेपन मनुष्य के शरीर से गंदगी को दूर करने की एक विधि है। जो वर्तमान समय की मसाज का प्राचीन रूप है।होलिका दहन के समय होलिका की परिक्रमा करने की परंपरा से शरीर में नहीं ऊर्जा का संचार होता है। वही होली के दिन रंग ,गुलाल खेलने की परंपरा वर्तमान समय में कलर थेरेपी का एक रूप हैं।जो मानसिक तनाव को कम करने के साथ व्यक्ति के शरीर में उल्लास उत्पन्न कर आलस को दूर भागने की एक विधि हैं। होली पर्व पर प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर त्वचा रोग से संबंधित बीमारियों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। होली मनाने की परंपरा बरसों की दुश्मनी एवं सारे गिले शिकवे भूलकर एक दूसरे को गले लगाने का भी संदेश देता है। यह परंपरा केवल एक सामाजिक रिवाज ही नहीं है बल्कि यह भारत की भावनात्मक,सांस्कृतिक और धार्मिक छवि का एक अटूट बंधन है।