गैंडा, हाथी से बारहसिंघा, वन मुर्गा तक जंगल में तीन घंटे का अद्भुत अनुभव
✍️ मुकेश पांडेय की कलम से
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
शनिवार यानि 13 जून को दुधवा वन्य जीव प्रभाग की यात्रा का सबसे रोमांचक सफर भोर की पहली किरण के साथ शुरू हुआ। पिछली शाम ही सर्वेश तिवारी जी ने हमारे लिए जंगल सफारी की व्यवस्था करा दी थी। सफारी वाहन के चालक और वन विभाग के एक कर्मचारी का रात लगभग नौ बजे फोन आया था। मैंने उनसे सुबह छह बजे आने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने सलाह दी कि जंगल की गतिविधियों का वास्तविक आनंद लेना है तो साढ़े पाँच बजे तक पूरी तरह तैयार रहना होगा। वन्यजीवों की दिनचर्या को देखते हुए उनका सुझाव बिल्कुल उचित था।
सुबह पाँच बजे ही हमारी नींद खुल गई। दुधवा के जंगल को करीब से देखने का उत्साह इतना अधिक था कि थकान का नामोनिशान नहीं था। निर्धारित समय पर सफारी वाहन होटल के बाहर पहुँच चुका था। मैं और मेरे मित्र दीपक शुक्ल जी साढ़े पाँच बजे वाहन में सवार हुए और दुधवा वन क्षेत्र की ओर चल पड़े।
करीब दस मिनट की यात्रा के बाद सड़क के दोनों ओर घना जंगल शुरू हो गया। ऊँचे-ऊँचे साल के वृक्ष, शीशम, खैर, जामुन, हल्दू, सागौन, सेमल, जामुन और असंख्य स्थानीय प्रजातियों के पेड़ तराई के इस वन को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। कहीं बाँस के झुरमुट थे तो कहीं लंबी घास हवा के साथ लहराती दिखाई दे रही थी। पेड़ों के बीच छनकर आती सुबह की धूप वातावरण को अलौकिक बना रही थी।
रास्ते में सुहेली नदी दिखाई दी। एक दिन पहले पहाड़ी क्षेत्र में हुई वर्षा के कारण नदी में अच्छा-खासा जल प्रवाह आ चुका था। मिट्टी से भरा गाढ़ा मटमैला पानी तेज़ी से बह रहा था। नदी के शांत हिस्से में कुछ घड़ियाल धूप सेंकते और बीच-बीच में पानी में डुबकी लगाते दिखाई दिए। यह दृश्य अत्यंत मनोहारी था, लेकिन चालक ने सलाह दी कि पहले जंगल के भीतर पहुँचना अधिक उचित रहेगा, इसलिए हम आगे बढ़ गए।
