✍️ मुकेश पांडेय की कलम से
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
रात्रि विश्राम के बाद रविवार की सुबह हम पुनः रामनगरी अयोध्या लौटने के लिए टनकपुर से रवाना हुए। मन में मां पूर्णागिरि के दर्शन की सुखद स्मृतियां थीं और यह संतोष भी कि कठिन चढ़ाई के बावजूद यात्रा सफल रही। पहाड़, जंगल, श्रद्धा और संघर्ष से भरे इन दो दिनों ने जीवन की अमूल्य यादों में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
यात्रा वृतांत के बीच यह बताना आवश्यक है कि टनकपुर पहुंचने से पहले हमने उत्तराखंड सरकार में अतिरिक्त सचिव (उद्योग) के पद पर कार्यरत अपने गुरु श्री लक्ष्मीनारायण पांडेय जी के सुपुत्र श्री उमेश नारायण पांडेय जी को दूरभाष पर अपने ठहरने की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने पूरे मनोयोग से हमारी यात्रा को सुगम बनाने के लिए आवश्यक प्रबंध कराया। इस संपूर्ण यात्रा में अनेक लोगों का अपनापन हासिल हुआ। विशेष रूप से श्री उमेश नारायण पांडेय जी का योगदान उल्लेखनीय रहा। उनसे सशरीर तो मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन दूरभाष पर वार्ता तनावमुक्त बनाए हुए थी। उनके आत्मीय सहयोग और मार्गदर्शन ने हमारी यात्रा को अधिक सहज और व्यवस्थित बनाया। उनके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हुए हमने मां पूर्णागिरि से यही प्रार्थना की कि भविष्य में फिर कभी इस पावन धाम में आने का सौभाग्य प्राप्त हो और अधिक समय लेकर इस आध्यात्मिक स्थल की दिव्यता का अनुभव किया जा सके।
नई इच्छा का जन्म
