अयोध्या। जिले के नामचीन प्राइवेट स्कूल पर शिक्षा को व्यापार बना रहे हैं। ड्रेस और स्टेशनरी के लिए स्कूलों द्वारा दुकानें व प्रकाशन तय कर दिए जाते हैं, जहां से कमीशन का खेल चलता है। हर साल किताबों के पब्लिकेशन बदल दिए जाते हैं, जिससे परिवार के अन्य बच्चों की पुरानी किताबें काम नहीं आ पातीं।
जिले में बेसिक तथा माध्यमिक स्तर के लगभग 1550 विद्यालय संचालित हैं, जबकि सीबीएसई से संबद्ध नर्सरी से इंटर तक के करीब 60 निजी विद्यालय हैं। इन मान्यता प्राप्त विद्यालयों में कई जगह एनसीईआरटी की किताबों का इस्तेमाल केवल औपचारिकता के रूप में किया जाता है, जबकि पढ़ाई निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों से कराई जाती है।
बिना स्टेशनरी के नहीं मिलती किताबें
फिक्स बुक सेलर के यहां ही किताबें उपलब्ध कराई जाती हैं। अभिभावकों को किताबों के साथ पेंसिल, रबर, कटर और कवर भी लेना पड़ता है, जिनकी कीमत सामान्य बाजार से काफी अधिक होती है। यदि स्टेशनरी न लेने की बात कही जाए तो किताबें देने से मना कर दिया जाता है, जिसको लेकर कई बार विवाद भी हो चुका है।
बाजार में नहीं मिलतीं तय प्रकाशन की किताबें
स्कूलों में चल रही पब्लिकेशन की किताबें बाहरी दुकानों पर उपलब्ध नहीं होतीं। इसके लिए दुकानों को पहले से तय कर दिया जाता है। अलग संस्करण का हवाला देकर अभिभावकों को उन्हीं दुकानों से किताबें खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
ड्रेस भी तय दुकान पर ही मिलेगी
ड्रेस के लिए भी विद्यालयों ने दुकानें तय की हुई है। एक स्कूल का ड्रेस केवल एक ही दुकान पर मिलेगा। 6बाजार में ड्रेस नही मिलेगा। इसकी कीमत भी क्वालिटी की अपेक्षा काफी अधिक होती है। दिन के हिसाब से अलग-अगल डेस बच्चों को पहननी होती है। बाहर से लेने पर स्कूल ऐतराज करता है।
“विद्यालय की वेबसाइट पर ऑनलाइन किताबों का ऑर्डर करना पड़ता है, जो घर या विद्यालय पर उपलब्ध कराई जाती हैं, वहीं से लेना अनिवार्य होता है।” — अभिषेक कुमार, अभिभावक
“महंगी फीस के साथ ही साल में आई कार्ड, डायरी व अन्य चीजों के नाम पर 2 से 4 हजार रुपये तक की वसूली की जाती है।” — राकेश सिंह, अभिभावक
“जांच के लिए टीमें गठित कर दी गई हैं। किताबों व स्टेशनरी को लेकर दबाव बनाने की शिकायत पर कार्रवाई की जाएगी।” — डॉ. पवन कुमार तिवारी, डीआईओएस अयोध्या