अंबेडकर नगर। भारत एक उत्सवधर्मी देश और सांस्कृतिक रूप से प्रकृति – पुरुष के अन्योनाश्रित संबंधों पर आधारित विभिन्न प्रकार के पर्वों को आदिकाल से मनाता रहा है। इन्हीं पर्वों में एक प्रमुख पर्व पुत्रदा छठ का भी पूर्वोत्तर भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में भारतीयों द्वारा भक्ति और श्रद्धापूर्वक प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की छठवीं तिथि को कृष्णपक्ष में मनाया जाता है।इसे ललई छठ और इसी दिन गर्भस्थ शिशुओं सहित संतानों की रक्षा करने वाले प्रमुख शेषावतार भगवान बलभद्र की भी जयंती मनाई जाती है।पुत्रवती माताएं इस दिन खेत से उत्पन्न किसी भी प्रकार के अनाज का सेवन न करके तिन्नी का चावल,महुवा और दही का सेवन करते हुए व्रत रखती हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता,हलधर बलराम जी का जन्म भी इसी तिथि को हुआ था।भागवत पुराण के अनुसार मथुरा के राजा उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था। वसुदेव भी चंद्रवंशी ग्वाल तथा अंधक के वंश से थे,किंतु जब कंस देवकी को ससुराल पहुंचा रहा था तो मार्ग में आकाशवाणी होने से भयभीत हो उसने वसुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया था।कारागार में ही देवकी की छह संतानों का वध कंस द्वारा किए जाने पर जब साक्षात् शेषनाग सातवीं संतान के रूप में गर्भ में आए तो भगवान नारायण ने योगमाया को आदेशित करते हुए कहा कि वह देवकी के गर्भस्थ शिशु को आकर्षण शक्ति से देवकी के गर्भ से खींचकर वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित करे।इसी के साथ नारायण ने योगमाया को यह भी आदेश दिया कि वे स्वयं आठवीं संतान के रूप में देवकी के गर्भ से जन्म लेंगें।इसलिए स्वयं योगमाया भी नंद की पत्नी यशोदा के गर्भ में पुत्री के रूप में स्वयं को अवधारित करे।नारायण के आदेश से योगमाया ने देवकी के सातवें गर्भ को रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित किया।यही विधि आज सरोगेसी कहलाती है।गर्भ के इस पुनर्स्थापन के कारण ही बलराम को संकर्षण नाम से भी जाना जाता है।बलराम जी का मुख्य अस्त्र हल होने के कारण उन्हें हलधर,लोगों का कल्याण करने के कारण राम और अतुलित बल होने के कारण बलराम कहा जाता है।योगमाया द्वारा देवकी के गर्भ का संकर्षण करने के कारण ही कहा जाता है कि देवकी का सातवां गर्भ गर्भपात हो गया था,जबकि वह रोहिणी के गर्भ में पल रहा था।इस प्रकार वास्तविक रूप से देखा जाय तो बलराम भी यथार्थ रूप में वसुदेव और देवकी के ही पुत्र थे।गर्भस्थ शिशु की इस प्रकार रक्षा किए जाने के कारण ही छठ के दिन हलधर बलराम जी की भी उनके प्रतीकों सहित पूजा की जाती है।इस कारण षष्ठी तिथि का धार्मिक महत्व अत्यंत बढ़ जाता है। बलराम जी धरती पर कृषि, बल, धर्म और न्याय के प्रतीक हैं।
हल और मूसल — बलराम जी के दो मुख्य आयुध, जो कृषक जीवन, श्रम और अन्न उत्पादन का प्रतीक हैं। पवित्रता और सरलता का द्योतक।भूमि को उपजाऊ बनाकर जन-जीवन के पालनकर्ता। केवल शारीरिक शक्ति ही नहीं, बल्कि धर्मबल और सत्यबल का प्रतीक भी माने जाते हैं।
पुत्रदा षष्ठी पर षष्ठी देवी के साथ बलराम जी का पूजन विशेष लाभकारी माना गया है।शास्त्रों में कहा गया है कि—बलराम जी संतान की रक्षा करते हैं।कृषक परिवार और गौ-पालन से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से पूजनीय हैं।बलराम जी के पूजन से परिवार में बल, धैर्य और समृद्धि का वास होता है।
महाभारत, आदिपर्व में कहा गया है—
बलदेवो महान्देवो हलिनां च प्रभुः स्मृतः।
पालयत्यखिलं लोकं धर्ता भूमेः सनातनः॥
इस प्रकार बलराम जी महान देवता हैं,वे हल चलाने वालों के स्वामी हैं, संपूर्ण लोक का पालन करते हैं और सदा धरती के धारक हैं।
पुत्रदा षष्ठी व्रत केवल षष्ठी देवी की कृपा पाने का साधन नहीं है, बल्कि इस तिथि का बलराम जन्मोत्सव से भी गहरा संबंध है। इस दिन बलराम जी की आराधना करने से संतान को स्वास्थ्य, दीर्घायु और धर्मनिष्ठ जीवन प्राप्त होता है, तथा परिवार में कृषि, पशुपालन और आजीविका में उन्नति होती है।