अयोध्या। राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया और थैलेसीमिया मरीजों की जांच के लिए खरीदी गई महंगी मशीनें लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी हैं। सरकारी धन से खरीदे गए इन उपकरणों के उपयोग में लापरवाही के आरोप सामने आ रहे हैं, जिसके चलते मरीजों को आज भी उपचार के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ रहा है।
करीब एक वर्ष पूर्व लगभग 13 लाख रुपये की लागत से ऑटोमैटिक कोएगुलोमीटर मशीन खरीदी गई थी, जो हीमोफीलिया की जांच के साथ खून बहने के कारणों का भी पता लगाने में सक्षम है। इस मशीन के आधार पर मरीजों को आवश्यक उपचार दिया जा सकता है, लेकिन रीजेंट की व्यवस्था न होने के कारण यह अब तक शुरू नहीं हो सकी है। बताया जाता है कि मशीन संचालन के लिए तकनीशियन को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है, बावजूद इसके यह उपयोग से बाहर है।
जिले में हीमोफीलिया के इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने से मरीजों को लखनऊ समेत अन्य शहरों में जाना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया सेंटर स्थापित कर दिया जाए, तो आसपास के जिलों के मरीजों को भी राहत मिल सकती है। इसके लिए अतिरिक्त उपकरणों और एक विशेष वार्ड की जरूरत होगी, जिस पर लगभग सात से आठ लाख रुपये का खर्च आएगा।
ब्लड बैंक विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश सिंह ने बताया कि मशीन के संचालन के लिए रीजेंट की उपलब्धता आवश्यक है, जिसके लिए कई बार प्रस्ताव भेजे गए, लेकिन पूर्व प्रशासन से स्वीकृति नहीं मिल सकी।
वहीं, थैलेसीमिया जांच की मशीन भी भुगतान संबंधी प्रक्रियाओं के कारण लंबे समय तक बंद रही। हालांकि, वर्तमान प्रबंधन ने भुगतान कर इसकी शुरुआत की दिशा में कदम बढ़ाए हैं और रीजेंट खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मशीनों के लंबे समय तक उपयोग न होने से उनकी वारंटी और गारंटी अवधि पर भी असर पड़ता है, जिससे भविष्य में रखरखाव का अतिरिक्त खर्च बढ़ सकता है।