अयोध्या। बच्चों और किशोरों में बढ़ते आवेशी तथा जोखिमपूर्ण व्यवहार के पीछे इम्पल्स कंट्रोल डिसऑर्डर समेत कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। डिजिटल कंटेंट का अत्यधिक इस्तेमाल इस समस्या को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल लत बढ़ने पर किशोरों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी और रोक-टोक के प्रति उग्र प्रतिक्रिया जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं।
टाइनी टॉट्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में आयोजित जागरूकता सत्र में डॉ. आलोक मनदर्शन ने बताया कि डिजिटल लत धीरे-धीरे बढ़ सकती है। शुरुआत में किशोर डिजिटल कंटेंट के बारे में लगातार सोचता रहता है। इसके बाद डिजिटल एक्सपोजर बढ़ने लगता है और फिर तलब को रोकने पर बेचैनी तथा चिड़चिड़ापन दिखाई दे सकता है। अत्यधिक इस्तेमाल की स्थिति में रोक-टोक किए जाने पर उग्र व्यवहार भी सामने आ सकता है।
उन्होंने बताया कि डिजिटल ओवर एक्सपोजर किशोरों के व्यवहार और भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा दोस्ती टूटना, पढ़ाई से जुड़ा तनाव, पारिवारिक मतभेद, अनुचित पालन-पोषण, साथियों का दबाव और नशे की लत जैसे कारक भी जोखिमपूर्ण व्यवहार को बढ़ा सकते हैं। कुछ मामलों में अभिभावकों या शिक्षकों की रोक-टोक के प्रति हिंसक या आत्मघाती प्रतिक्रिया भी देखने को मिल सकती है।
संवाद और निगरानी जरूरी
डॉ. मनदर्शन ने अभिभावकों और शिक्षकों से किशोरों की गतिविधियों पर मैत्रीपूर्ण नजर रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि परिवार और स्कूल में स्वस्थ संवाद के साथ खेलकूद एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। डिजिटल डिटॉक्स के लिए अभिभावकों को स्वयं भी संतुलित डिजिटल व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। लंबे समय तक गुमसुम, अत्यधिक आक्रामक या असामान्य व्यवहार दिखाई देने पर मनोपरामर्श लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
यह सत्र जेन-जी युवाओं में बढ़ते आवेशी व्यवहार और आत्मघाती रुझानों को लेकर चल रही शैक्षिक संस्थान कार्यशाला श्रृंखला के तहत आयोजित किया गया। निदेशिका बिन्नी सिंह की अध्यक्षता, आशा तिवारी के संयोजन और एकता भूटानी के संचालन में हुए कार्यक्रम में स्कूल का फैकल्टी और स्टाफ मौजूद रहा।