Home Ayodhya/Ambedkar Nagar अयोध्या जुआखोरी आत्मघाती मनोविकार, डिजिटल सट्टेबाजी युवाओं को बना रही दिवालिया

जुआखोरी आत्मघाती मनोविकार, डिजिटल सट्टेबाजी युवाओं को बना रही दिवालिया

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◆ नींद और भूख छोड़कर सट्टेबाजी में डूबे रहते हैं लती लोग, अवसाद से लेकर हिंसा और आत्मघाती प्रवृत्ति तक का बढ़ता है खतरा : डॉ. आलोक मनदर्शन


अयोध्या। ऑनलाइन जुआ और सट्टेबाजी का बढ़ता चलन किशोरों और युवाओं को मानसिक बीमारी तथा आर्थिक बदहाली की ओर धकेल रहा है। जुआखोरी केवल आर्थिक नुकसान का कारण नहीं, बल्कि एक गंभीर मनोविकार है। इसे मेडिकल भाषा में कम्पल्सिव गैम्बलिंग कहा जाता है। इस लत से ग्रसित व्यक्ति नुकसान उठाने के बावजूद बार-बार जुआ खेलने के अवसर तलाशता रहता है। क्रिकेट मैच, त्योहारों और अन्य विशेष अवसरों पर यह लत इतनी हावी हो जाती है कि व्यक्ति अपनी नींद और भूख तक की परवाह करना छोड़ देता है। यह जानकारी जिला चिकित्सालय के मन कक्ष में आयोजित जुआखोरी मनोविकार विषयक वार्ता में डॉ. आलोक मनदर्शन ने दी।


डा आलोक मनदर्शन
मनो परामर्शदाता, जिला चिकित्सालय अयोध्या

उन्होंने बताया कि जुआखोरी की लत से ग्रसित व्यक्ति को कम्पल्सिव गैम्बलर कहा जाता है। ऐसे लोगों में धीरे-धीरे जुआ खेलने की तीव्र इच्छा विकसित हो जाती है। आर्थिक नुकसान होने के बावजूद वे इस आदत पर नियंत्रण नहीं रख पाते। इसके परिणामस्वरूप अवसाद, नशाखोरी, उन्माद, हिंसा, मारपीट और आत्मघाती प्रवृत्तियों का खतरा बढ़ सकता है। ऑनलाइन गैंबलिंग और सट्टेबाजी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। डिजिटल माध्यमों की आसान उपलब्धता के कारण किशोर और युवा तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं।


डोपामिन का बढ़ता प्रभाव बनाता है लत का शिकार


डॉ. आलोक मनदर्शन ने मनोगतिकीय विश्लेषण करते हुए बताया कि कम्पल्सिव गैम्बलिंग में व्यक्ति के मस्तिष्क की पुरस्कार और आनंद से जुड़ी प्रणाली प्रभावित होती है। जुआ खेलने के दौरान डोपामिन नामक मनोरसायन की सक्रियता बढ़ती है, जिससे व्यक्ति को बार-बार जुआ खेलने का तीव्र आकर्षण महसूस होता है। नुकसान होने के बावजूद वह इस उम्मीद में खेलता रहता है कि अगली बार उसकी भरपाई हो जाएगी। धीरे-धीरे उसे पहले जैसी उत्तेजना पाने के लिए अधिक समय और अधिक जोखिम की जरूरत महसूस होने लगती है। इसे एडिक्शन टॉलरेंस कहा जाता है। जुआखोरी को व्यवहार आधारित लत यानी प्रोसेस एडिक्शन के रूप में भी समझा जाता है।


जागरूकता, व्यवहार प्रशिक्षण और पारिवारिक सहयोग जरूरी


उन्होंने बताया कि जुआखोरी की लत से ग्रसित व्यक्ति को अक्सर यह एहसास नहीं होता कि वह मनोरोग की चपेट में आ चुका है। ऐसे में सबसे पहले उसे समस्या के प्रति जागरूक करना जरूरी है। जुआ खेलने की इच्छा पूरी न होने पर होने वाली बेचैनी और मानसिक तनाव से निपटने के लिए बिहेवियर ट्रेनिंग और चिकित्सकीय परामर्श मददगार हो सकते हैं। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार दवाओं का भी उपयोग किया जाता है।

डॉ. मनदर्शन के अनुसार जुआ और सट्टेबाजी से जुड़े समूहों तथा गतिविधियों से दूरी बनाना, रचनात्मक कार्यों में खुद को व्यस्त रखना और परिवार का भावनात्मक सहयोग इस लत से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) और इम्पल्स कंट्रोल थेरेपी भी उपचार में प्रभावी साबित हो सकती हैं। समय रहते पहचान और उचित उपचार से इस समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

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