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कृषि विवि में ऑडिट आपत्तियां : शोध के नाम पर धन का दुरूपयोग, 18 परियोजनाओं पर सवाल 

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◆ 2019 से 2025 की आडिट में जताई गयी परियोजना निधि के दुरुपयोग व मद में स्थानांतरण की सम्भावना


◆  आडिट के सवाल उठाने के बाद लेखा परिक्षित इकाई द्वारा उत्तर न देने का आरोप, शोध प्रमुख 15 दिन पहले जवाब देने का किया दावा


अयोध्या। विभिन्न शिकायतों की जांच का सामना कर रहे आचार्य नरेन्द्र देव कृषि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार विश्वविद्यालय के पर धन के दुरुपयोग का आरोप लगा है। सबसे खास बात यह है कि विश्वविद्यालय के उपर यह सवाल किसी और ने बल्कि एक सरकारी संस्था ने उठाए है।

नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या के नियंत्रणधीन राज्य सरकार द्वारा प्राप्त वित्त पोषित गैर-योजना अनुसंधान परियोजना (नॉन प्लान प्रोजेक्ट) के कुल 18 परियोजनाएं स्वीकृत की गई थी। जिसको लेकर ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 से 2025 तक अनुसंधान कार्य न किए जाने के कारण से सम्बंधित अभिलेख लेखा संपरीक्षा दल को विश्वविद्यालय ने नहीं उपलब्ध कराए तथा यह भी स्पष्ट नहीं किया कि सम्बद्ध कर्मचारियों का वेतन परियोजना मद से दिया जा रहा है अथवा किसी अन्य मद से। वहीं दूसरी तरफ शोध प्रमुख ने 15 दिन पहले आपत्तियों का जवाब देने का दावा किया।

आडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 अनुसंधान परियोजनाओं में कोई कार्य न किए जाने से स्वीकृत परियोजनाओं के उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी तथा परियोजनाओं पर व्यय हुए विशेषकर वेतन एवं स्थापना व्यय को अप्रयुक्त तथा अनुपयोगी व्यय माना जाएगा। इसके साथ ही परियोजना निधियों के दुरुपयोग अथवा अन्य मद में स्थानांतरण की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। आडिट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसके सम्बंध में लेखा परीक्षित इकाई ने कोई उत्तर नहीं दिया और न ही कोई अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किया। इसलिए वर्ष 2019 से 2025 तक कुल 18 अनुसंधान परियोजनाओं में व्यय के बाबजूद कोई कार्य आरम्भ नहीं किए जाने लक्ष्यों की पूर्ति नहीं किए जाने का प्रकरण प्रकाश में लाया जाता है।

लेखा संपरीक्षा आपत्तियों में जिन शोध परियोजनाओं और वैज्ञानिकों को जिम्मेदार माना गया है, उनमें धान शोध परियोजना, नार्प मिर्जापुर एवं फाउंडेशन-ब्रीडर बीज परियोजना (डॉ. एस.सी. विमल), ऑयल सीड प्रोजेक्ट (डॉ. संजीत कुमार), सब्जी फसल शोध परियोजना (डॉ. सी.एन. राम), दलहन परियोजना (डॉ. आकाश गौरव सिंह), क्रॉप फिजियोलॉजी पर शोध (डॉ. आर.के. यादव), नार्प मिर्जापुर (डॉ. आर.बी. गौतम), नार्प घाघराघाट (डॉ. महेंद्र सिंह), नार्प बहराइच, गाजीपुर व जूट इस्टेब्लिशमेंट स्कीम (डॉ. मनीष कुशवाहा), गाजीपुर केंद्र की शोध योजनाएं (डॉ. विनोद कुमार चौरसिया), फल विज्ञान विभाग (सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ. संजय पाठक) तथा नार्प योजना बसूली (डॉ. डी.पी. सिंह) शामिल हैं। इसके अलावा मुख्य परिसर में संचालित नार्प योजना के लिए मुख्य प्रयोग केंद्र के निदेशक को भी जिम्मेदार ठहराया गया है।

आडिट रिपोर्ट में लिखे यह शब्द विश्वविद्यालय में गम्भीर वित्तीय अनियमित्ता होने की ओर ईशारा करते है। यह रिपोर्ट तब सामने आई है, जब विश्वविद्यालय पहले से गम्भीर आरोपों का सामना कर रहा है। जिसमें विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बिजेन्द्र सिंह के कार्यकाल से जुड़ी शिकायतों की जांच मण्डलायुक्त कर रहे है। इसके साथ में वित्त नियंत्रक नीरज श्रीवास्तव पर धन के अपव्यय और नियमों के विरुद्ध कार्य करने के आरोप लगे है। जिसकी शिकायत भाजपा विधायक व विश्व विद्यालय प्रबंधन परिषद के सदस्य रामचन्दर यादव ने किया है। प्रकरण में कृषि विश्वविद्यालय के शोध निदेशक शंभू प्रसाद ने बताया कि ऑडिट  द्वारा लगाई गई आपत्तियों का 15 दिन पूर्व जवाब दिया जा चुका है।

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