Thursday, June 18, 2026
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यात्रा वृतांत: पूर्णागिरी की ओर अविस्मरणीय यात्रा में सरयू के दिव्य दर्शन


अयोध्या से पूर्णागिरी का सौंदर्य ,  रिश्तों की गर्माहट, प्रकृति का सान्निध्य और यादों से भरा सफर


✍️ मुकेश पांडे की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का साधन नहीं होतीं, वे मनुष्य को लोगों, प्रकृति और स्वयं से जोड़ने का माध्यम भी बनती हैं। कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जो अपने गंतव्य से अधिक रास्ते की वजह से याद रह जाती हैं। दुधवा राष्ट्रीय उद्यान होते हुए उत्तराखंड के चंपावत जनपद स्थित अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला की चोटी पर 51 शक्तिपीठों में शामिल पूर्णागिरि की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही, जिसमें तराई की हरियाली, पहाड़ का अद्भुत वैभव, पुराने मित्रों का स्नेह देखने को मिला।पत्रकारिता के दिनों की स्मृतियाँ भी जीवंत हो उठीं।

गुरुवार का दिन था। महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी जी के सरकारी आवास पर मित्रों के बीच सामान्य चर्चा चल रही थी कि फैजाबाद अब अयोध्या के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं अभिन्न मित्र दीपक शुक्ल ने अचानक दुधवा वन्य जीव प्रभाग घूमने की इच्छा व्यक्त की। जून की तपती गर्मी और मानसून के आगमन की दस्तक को देखते हुए पहले मन में विचार आया कि इस समय ऐसी यात्रा टाल दी जाए, लेकिन कहते हैं कि ईश्वर की इच्छा, अच्छे साथ के सामने संकोच अधिक देर टिक नहीं पाता। दीपकजी के आग्रह और उनके उत्साह ने मन बदल दिया और देखते ही देखते दुधवा की यात्रा का निर्णय पक्का हो गया।


मित्रों का साथ बनी यात्रा की बड़ी ताकत


ज्योतिषाचार्य दीपक शुक्ला व मुकेश पाण्डेय

यात्रा की योजना बनते ही लखीमपुर खीरी जिले में कार्यरत परिचितों से संपर्क शुरू हुआ। सबसे पहले नवाबगंज (गोंडा) के दुर्जनपुर गाँव निवासी पुराने साथी संदीप तिवारी से बात हुई, जो धौरहरा ब्लॉक में खंड विकास अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से स्वागत किया और बताया कि हमारे एक अन्य परिचित सर्वेश तिवारी जी पलिया ब्लॉक में खंड विकास अधिकारी हैं, जिसका दुधवा वन क्षेत्र हैं। सो सर्वेश तिवारी को फोन कर दिया। सर्वेश ने हमारी यात्रा का पूरे मनोयोग से स्वागत किया। उन्होंने आश्वस्त किया कि दुधवा पहुँचने पर किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी। उनकी सहजता और अपनापन इस बात का प्रमाण था कि सच्चे रिश्ते समय और दूरी से कमजोर नहीं पड़ते।

इसी दौरान जानकारी मिली कि जिला ग्राम्य विकास अभिकरण में परियोजना निदेशक (पीडी) के पद पर श्री सतीश पांडे जी कार्यरत हैं। उनसे वर्षों पुराना परिचय रहा है। जब वह बलरामपुर और बाद में बहराइच में उपायुक्त मनरेगा के रूप में कार्यरत थे, तब मैं दैनिक जागरण बहराइच में ब्यूरो प्रमुख की जिम्मेदारी निभा रहा था। उनसे पेशेवर मुलाकातों ने धीरे-धीरे आत्मीय संबंध का रूप ले लिया। बाद में उनके कार्यस्थल बदले, मेरे दायित्व बदले, लेकिन संबंधों की डोर पहले जैसी ही मजबूत बनी रही।

जब उन्हें दुधवा आने की सूचना दी तो उन्होंने बिना औपचारिकता के कहा, “आप लखीमपुर खीरी होकर आइए, मैं आपका इंतजार करूँगा। आपकी यात्रा की पूरी चिंता मेरी है।” यह विश्वास किसी भी यात्री के लिए सबसे बड़ा संबल होता है।


सुबह की शुरुआत और सफर का नया अध्याय


शुक्रवार की सुबह ठीक आठ बजे दीपक शुक्ल अपनी कार लेकर मेरे आवास पहुँचे। यात्रा की सारी तैयारियाँ पहले से पूरी थीं। आवश्यक सामान वाहन में रखा गया और हम लोग गोंडा होते हुए बहराइच की दिशा में निकल पड़े। सुबह की ताजगी, खुले रास्ते और आगे आने वाले अनुभवों की उत्सुकता ने पूरे माहौल को आनंदमय बना दिया।

सड़क के दोनों ओर फैले खेत, गाँवों की सादगी और धीरे-धीरे बदलता भू-दृश्य यह संकेत देने लगा था कि हम उत्तर प्रदेश के उस हिस्से की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ तराई की प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है।


बहराइच में पुरानी यादों का पड़ाव


बहराइच पहुँचने पर एक सुखद संयोग हुआ। दैनिक जागरण के पुराने पत्रकार साथी अनिल कुशवाहा जी अपने न्यायिक कार्य से शहर में ही मौजूद थे। सूचना मिलते ही उन्होंने मिलने की इच्छा जताई और हम लोग शर्मा की चाय की प्रसिद्ध दुकान पर एकत्र हुए।

गर्म चाय की चुस्कियों के साथ पत्रकारिता के दिनों की अनेक स्मृतियाँ ताजा होती चली गईं। पुराने घटनाक्रम, साझा अनुभव और साथ बिताए गए संघर्षपूर्ण दिन मानो फिर से आँखों के सामने जीवंत हो उठे। लगभग आधे घंटे की यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि इसने यात्रा में भावनात्मक गहराई जोड़ दी।


सरयू का पुल और प्रकृति की पहली झलक


बहराइच से आगे बढ़ते हुए हम मिहींपुरवा क्षेत्र पहुँचे, जहाँ सरयू नदी का विस्तृत प्रवाह यात्रियों का स्वागत करता है। मानसरोवर क्षेत्र से निकलकर नेपाल में बहने वाली यह नदी वहाँ “भादा नदी” के नाम से जानी जाती है और भारत में प्रवेश करने के बाद अपने शांत एवं सौम्य स्वरूप से लोगों को आकर्षित करती है।

पुल पर वाहन रोक दिया गया। कुछ देर तक बहते जल को निहारते रहे। हवा में नमी थी, आकाश में बादलों की हल्की आवाजाही और नीचे शांत गति से बहती नदी!

यह दृश्य किसी चित्रकार की कल्पना जैसा प्रतीत हो रहा था। स्मृतियों के लिए कुछ तस्वीरें और सेल्फियाँ ली गईं। पाँच-सात मिनट का यह छोटा-सा विराम मन को नई ऊर्जा से भर गया।


कतर्नियाघाट जंगल का मौन और जीवन का संगीत


इसके बाद यात्रा कतर्नियाघाट वन क्षेत्र की ओर बढ़ी। जैसे-जैसे वाहन आगे बढ़ता गया, सड़क के दोनों ओर हरियाली घनी होती चली गई। ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, दूर तक फैले वन और बीच से गुजरती सड़क ऐसा अनुभव करा रहे थे कि मानो प्रकृति ने स्वयं यात्रियों के लिए हरी सुरंग बना दी हो।

यहाँ का वातावरण शहरों की भागदौड़ से बिल्कुल अलग लग रहा था। हवा में शुद्धता थी। पक्षियों की आवाजें संगीत का आभास करा रही थीं और जंगल का मौन भी बहुत कुछ कहता हुआ महसूस हो रहा था। तराई क्षेत्र की जैव विविधता और प्राकृतिक संपन्नता इस पूरे मार्ग को विशेष बना रही थी। हम तो इस इलाके से पहले से परिचित थे लेकिन दीपक जी की हिमालय की तलहटी के प्राकृतिक सौंदर्य से यह पहली मुठभेड़ थी। वह बार-बार रोमांचित हो उठते।


बढ़ते कदम और मन का विस्तार


जैसे-जैसे हम कतर्निया जंगल के बीच से गुजर रहे थे, मन में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। रास्ते में मिलने वाले स्थानीय लोग, छोटे बाजार, खेतों के बीच बसे गाँव और वन क्षेत्र का बदलता स्वरूप इस यात्रा को और अधिक जीवंत बना रहा था। यह महसूस हो रहा था कि जंगल केवल वन्यजीवों का आश्रय स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के सहअस्तित्व की एक अनमोल मिसाल है। यहाँ पहुँचने से पहले ही उसकी छवि मन में बस चुकी थी।


रिश्ते, स्मृतियाँ और प्रकृति -यात्रा का वास्तविक सार


इस पूरे सफर ने एक बात फिर सिद्ध कर दी कि यात्रा की खूबसूरती केवल उसके गंतव्य में नहीं होती। रास्ते में मिलने वाले लोग, वर्षों पुराने मित्रों का अपनापन, सहज सहयोग, साझा स्मृतियाँ और प्रकृति के बीच बिताए गए छोटे-छोटे पल ही उसे अविस्मरणीय बनाते हैं।

दुधवा की ओर जाते हुए महसूस हुआ कि तराई की हरियाली केवल जंगलों तक सीमित नहीं है; वह उन मानवीय संबंधों में भी दिखाई देती है जो समय बीतने पर और अधिक हरे-भरे हो जाते हैं। मित्रों का विश्वास, पुराने साथियों का स्नेह, सरयू का शांत प्रवाह, कतरनियाघाट की हरियाली और रास्ते की सहज मुस्कानें इस यात्रा की ऐसी पूँजी बन गईं जिन्हें शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना कठिन है। दुधवा की राह पर यह पहला चरण ही काफी समृद्ध और भावनात्मक रहा।

क्रमश: …………………..

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