(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
गोला गोकर्णनाथ में दर्शन-पूजन के उपरांत हम बहराइच की ओर चल पड़े। अब यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का माध्यम नहीं रह गई थी, बल्कि मित्रों, आत्मीयजनों और पुरानी स्मृतियों से मिलने का एक सुखद अवसर बन चुकी थी।
उर्रा पहुंचकर हमने अपने पुराने साथी अनिल कुशवाहा के यहां अल्पाहार लिया। वर्षों बाद भी उनकी आत्मीयता और अपनापन वैसा ही महसूस हुआ, जैसा पहले था। कुछ ही देर में पत्रकारिता जगत से जुड़े प्रिय अनुज मनीष सिंह और योगेंद्र मौर्य भी वहां पहुंच गए। फिर शुरू हुआ पुरानी यादों की चर्चा का ऐसा सिलसिला, जिसमें पत्रकारिता के संघर्ष, बीते दौर के अनुभव, पुराने संस्मरण और अनेक घटनाएं एक-एक कर सामने आती चली गईं। बातचीत में समय का ध्यान ही नहीं रहा और लगभग दो घंटे कब बीत गए, इसका एहसास आगे की यात्रा की तैयारी करते समय हुआ। यह मुलाकात पूरे सफर की सबसे मधुर स्मृतियों में शामिल हो गई। विदा होते समय अनिल कुशवाहा जी ने अपने क्षेत्र की प्रसिद्ध मिठाई ‘मिलिक केक’ भेंट कर स्नेह को और भी मधुर बना दिया।
इसके बाद हम बहराइच की ओर बढ़े। आगमन की सूचना मिलने पर मनीष मल्होत्रा जी ने अपने होटल ‘बिल्स रिजॉर्ट’ में भोजन का आग्रह किया, किंतु हम पहले ही भोजन कर चुके थे। इसलिए शहर में मिलने का कार्यक्रम तय हुआ। मित्र मनोज गुप्त ने रामलीला मैदान के सामने स्थित अपने आइसक्रीम पार्लर पर आने का आग्रह किया और बताया कि मनीषजी भी वहीं पहुंचेंगे।
निर्धारित स्थान पर पहुंचने पर मनोज भाई ने आत्मीय स्वागत किया। कुछ ही देर में मनीष जी भी आ गए। यात्रा की थकान के बीच आइसक्रीम के साथ हुई अनौपचारिक बातचीत ने पूरे वातावरण को आनंदमय बना दिया। विदाई के समय मनीष जी ने अंगवस्त्र (शाल) भेंट कर सम्मानित किया। उस क्षण यह अनुभूति और गहरी हुई कि किसी भी लंबी यात्रा की सबसे बड़ी ऊर्जा रास्ते में मिलने वाला स्नेह और अपनापन ही होता है।
बहराइच प्रवास के दौरान अपने संबंधी डॉ. परितोष तिवारी तथा बड़े भाई कालिका प्रसाद पांडे जी से मिलने का अवसर भी मिला। पारिवारिक आत्मीयता, कुशलक्षेम और पुराने प्रसंगों पर हुई चर्चा ने मन को विशेष संतोष प्रदान किया। व्यस्त जीवन में ऐसे अवसर विरले ही मिलते हैं, जब एक ही यात्रा में मित्रों और परिजनों से एक साथ मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो।
रामनगरी की ओर अंतिम पड़ाव
संध्या ढलने से पहले हमने पुनः रामनगरी अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। वाहन आगे बढ़ रहा था, किंतु मन बार-बार पीछे छूटे दृश्यों में लौट जाता था, दुधवा के घने जंगल, पीलीभीत की हरियाली, शारदा नहर का मनोहारी विस्तार, टनकपुर की पर्वतीय घाटियां, मां पूर्णागिरि की कठिन चढ़ाई, मंदिर की दिव्य अनुभूति, गोला गोकर्णनाथ का पावन वातावरण और यात्रा के दौरान मिले मित्रों तथा आत्मीयजनों का स्नेह।
एक ऐसी यात्रा, जो स्मृतियों में बस गई
यह यात्रा केवल पर्यटन या तीर्थाटन तक सीमित नहीं थी। इसमें प्रकृति का अनुपम सौंदर्य था, आस्था की अटूट शक्ति थी, मित्रता की ऊष्मा थी, रिश्तों की मिठास थी और जीवन के विविध रंगों का अद्भुत संगम था।
इस पूरे प्रवास ने बहुत कुछ सिखाया। कठिन पर्वतीय चढ़ाई ने धैर्य और दृढ़ संकल्प का पाठ पढ़ाया। मंदिरों ने आध्यात्मिक ऊर्जा से मन को आलोकित किया और रास्ते में मिले लोगों ने यह एहसास कराया कि रिश्ते, विश्वास और अपनापन ही किसी भी यात्रा को वास्तव में यादगार बनाते हैं।
जब हम अंततः रामनगरी अयोध्या लौटे, तब मन में यही भाव था कि यात्रा भले ही समाप्त हो गई हो, किंतु उसकी स्मृतियां लंबे समय तक हृदय में जीवंत रहेंगी। मां पूर्णागिरि के दिव्य दर्शन, भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद, मित्रों का स्नेह और पूरे मार्ग में मिले अनुभव जीवन की ऐसी अमूल्य धरोहर बन गए हैं, जिन्हें समय बीतने के साथ भी भुलाया नहीं जा सकेगा।