Home Ayodhya/Ambedkar Nagar अयोध्या शैक्षिक संस्थानों में शुरू हुआ सुसाइड जागरूकता श्रृंखला सत्र

शैक्षिक संस्थानों में शुरू हुआ सुसाइड जागरूकता श्रृंखला सत्र

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डा आलोक मनदर्शन मनो परामर्शदाता, जिला चिकित्सालय अयोध्या

◆ किशोर-युवा वर्ग में मौत का तीसरा प्रमुख कारक है आत्मघात

◆ जागरूकता, संवाद और उपचार से आत्मघात की प्रवृत्ति पर लग सकती है रोक

अयोध्या। किशोर और युवा वर्ग में बढ़ते मानसिक तनाव और आत्मघात की प्रवृत्ति को रोकने के लिए शैक्षिक संस्थानों में सुसाइड जागरूकता श्रृंखला सत्र शुरू किया गया है। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, इंटर कॉलेज, तकनीकी संस्थान और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर विद्यार्थियों को आत्मघाती विचारों से बाहर निकलने के लिए संवाद, समानुभूति, उपचार और सहयोग का महत्व बताया जा रहा है।
जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता एवं जागरूकता श्रृंखला सत्र के नामित वक्ता डॉ. आलोक मनदर्शन ने बताया कि दुनिया में प्रतिवर्ष करीब 7.4 लाख आत्महत्याएं होती हैं। वहीं देश में प्रतिवर्ष करीब 1.72 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या मौत का तीसरा प्रमुख कारक बन चुकी है। उन्होंने बताया कि युवाओं में आवेग, अपराधबोध, हताशा, अकादमिक एवं करियर तनाव, अभिभावकों का दबाव, प्रेम संबंधों में संघर्ष, यौन शोषण, जुआ व नशे की लत, अवसाद, मूड डिसऑर्डर और सिजोफ्रेनिया जैसे कारण आत्मघाती प्रवृत्ति को बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अकेलापन, प्रियजन की मृत्यु, आर्थिक नुकसान या कर्ज, कानूनी परेशानी, आपदा-महामारी, भुखमरी, गरीबी और गंभीर बीमारी भी आत्मघात के अन्य प्रमुख कारण हो सकते हैं। आत्मघाती मनोदशा में व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है और वह आवेग में घातक कदम उठा सकता है।

चुप्पी तोड़कर संवाद पर जोर

विश्व आत्महत्या-निवारण दिवस 10 सितंबर के अवसर पर इस वर्ष आत्महत्या के प्रति नजरिये को बदलने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य आत्महत्या से जुड़े चुप्पी, संकोच और मिथकों को तोड़कर बातचीत, समानुभूति, उपचार और सहयोग की संस्कृति को बढ़ावा देना है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार की मंशा के अनुरूप शैक्षिक संस्थानों में सतत जागरूकता श्रृंखला सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
डॉ. आलोक मनदर्शन ने बताया कि सभी शैक्षिक संस्थानों को प्राथमिकता के आधार पर जागरूकता सत्र आयोजित कर अधिक से अधिक विद्यार्थियों को इससे लाभान्वित करने की अपेक्षा की गई है। समय रहते मानसिक तनाव की पहचान, परिवार और शिक्षकों का सहयोग तथा जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से उपचार लेने से आत्मघाती विचारों को गंभीर कदम में बदलने से रोका जा सकता है।

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