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बसंत ऋतु मनोउमंग और मानसिक स्वास्थ्य के लिए नैसर्गिक उपचार : डॉ. आलोक मनदर्शन

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अयोध्या। बसंत ऋतु का आगमन केवल मौसम में बदलाव नहीं, बल्कि मन और मस्तिष्क के लिए प्राकृतिक उपचार का संदेश लेकर आता है। शीत ऋतु में होने वाले भावनात्मक विकारों जैसे उदासी, निराशा, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा या अतिनिद्रा, अनमनापन, मूड स्विंग, थकान और भूख में बदलाव से निजात दिलाने में बसंत ऋतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह बातें जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने बसंत पंचमी पर्व पर आयोजित मनोप्रभाव विषयक वार्ता में कहीं।

डा आलोक मनदर्शन
मनो परामर्शदाता, जिला चिकित्सालय अयोध्या

डॉ. आलोक मनदर्शन ने कहा कि बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही सूर्य प्रकाश की अवधि बढ़ जाती है, जिससे शरीर में “हैप्पी हार्मोन” सेरोटोनिन की मात्रा बढ़ती है, वहीं तनाव से जुड़े हार्मोन कार्टिसाल और एड्रिनलिन में कमी आती है। गुनगुनी गर्माहट, प्राकृतिक स्थलों में भ्रमण, ध्यान, संगीत साधना और सरस्वती पूजन से डोपामिन, इंडॉर्फिन और ऑक्सीटोसिन जैसे सकारात्मक हार्मोनों का स्तर बढ़ता है, जो मनोउमंग और मानसिक संतुलन को मजबूत करते हैं।

उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी की आराध्य देवी सरस्वती विद्या, वाणी, बुद्धि और विवेक की प्रतीक हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख आधार स्तंभ माने जाते हैं। श्वेत वस्त्रधारी देवी सरस्वती की प्रतिमा मनोशांति का प्रतीक है, क्योंकि कलर थैरेपी में सफेद रंग को लो-स्टिमुलस श्रेणी में रखा गया है, जो मानसिक शांति प्रदान करता है।

डॉ. मनदर्शन ने बताया कि वीणा वादन और कर्मशील जीवन का संदेश देती है। वीणा के तार यह सिखाते हैं कि जीवन न अधिक ढीला हो और न अत्यधिक कसा हुआ, बल्कि संतुलित और सम्यक दशा में रहे, तभी जीवन संगीतमय बनता है। उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी पर्व मनोउमंग, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने का अवसर है।

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