Friday, March 6, 2026
HomeAyodhya/Ambedkar Nagarअम्बेडकर नगरखामेनेई की मौत पर भारत में प्रदर्शन: अभिव्यक्ति की आजादी या कट्टरपंथ...

खामेनेई की मौत पर भारत में प्रदर्शन: अभिव्यक्ति की आजादी या कट्टरपंथ को बढ़ावा?


◆ विदेशी नेताओं की मौत को लेकर देश में विरोध प्रदर्शन पर छिड़ी नई बहस


@ सुभाष गुप्ता


अम्बेडकर नगर। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर के बाद भारत के कुछ स्थानों पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के प्रदर्शन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं, या फिर इससे कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलता है।

देश के कुछ स्थानों पर खामेनेई को ‘रहबर’ और ‘शहीद’ बताकर प्रदर्शन किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इसको लेकर कई लोग यह तर्क दे रहे हैं कि किसी दूसरे देश के नेता को लेकर भारत में इस प्रकार का प्रदर्शन करना देश की एकता, अखंडता और विदेश नीति के लिहाज से उचित नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के सुप्रीम नेता के रूप में खामेनेई की भूमिका ईरान या इस्लाम के एक वर्ग के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन भारत के संदर्भ में उनके प्रत्यक्ष योगदान को लेकर कोई ठोस उदाहरण सामने नहीं आता। दूसरी ओर, तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्रों में इजरायल के साथ भारत के संबंध अपेक्षाकृत अधिक मजबूत माने जाते हैं।

हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यदि युद्ध के दौरान निर्दोष नागरिकों की मौत होती है तो उसके विरोध में आवाज उठाना मानवीय दृष्टिकोण से स्वाभाविक है। लेकिन किसी विदेशी नेता को शहीद घोषित करना या उनके नाम पर शोक दिवस घोषित करना अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा से आगे जाने जैसा माना जा रहा है।

यह पहला अवसर नहीं है जब विदेशी नेताओं को लेकर भारत में इस तरह के विरोध प्रदर्शन हुए हों। इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के दौरान ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आ चुकी हैं। वर्ष 2006 में इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने के बाद केरल, कश्मीर और दिल्ली समेत कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय भी कुछ लोगों ने सद्दाम को ‘रहबर’ और ‘मसीहा’ बताकर प्रदर्शन किए थे।

इतिहास बताता है कि सद्दाम हुसैन के शासनकाल में ईरान-इराक युद्ध और कुवैत पर हमले जैसे कई विवादित घटनाक्रम हुए। उन पर नरसंहार, यातना और बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे, जिनके चलते उन्हें 30 दिसंबर 2006 को फांसी दी गई थी।

अब खामेनेई की मौत के बाद फिर से इस प्रकार के प्रदर्शन सामने आने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत के भीतर विदेशी संघर्षों को लेकर इस तरह की प्रतिक्रियाएं उचित हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व का यह संघर्ष आगे चलकर बड़े वैश्विक युद्ध का रूप लेता है, तो भारत जैसे देश के लिए संतुलित कूटनीति और आंतरिक सामाजिक सौहार्द बनाए रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा।

भारत परंपरागत रूप से वसुधैव कुटुंबकम की भावना के साथ विश्व शांति का पक्षधर रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर देश के भीतर होने वाली प्रतिक्रियाओं को भी संतुलित और जिम्मेदार बनाने की जरूरत बताई जा रही है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

RELATED ARTICLES

Most Popular

Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar

Recent Comments