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कजपुरा बना ‘घोटालों का अड्डा’: बिना तारीख-हस्ताक्षर के बिलों पर लाखों की बंदरबांट

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ayodhya samachar

अम्बेडकर नगर। जनपद के विकासखंड जलालपुर की ग्राम पंचायत कजपुरा इन दिनों विकास कार्यों के लिए नहीं, बल्कि कथित घोटालों और फर्जी बिलों के खेल को लेकर सुर्खियों में है। आरोप है कि यहां बिना दिनांक, बिना हस्ताक्षर और बिना मोहर के बिलों के आधार पर सरकारी धन का भुगतान कर दिया गया और उन बिलों को बाकायदा सरकारी वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया।

शिकायतकर्ता सत्यम श्रीवास्तव द्वारा लगाए गए आरोप पंचायत स्तर पर संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं। आरोपों के मुताबिक ग्राम प्रधान अफसाना बानो, ग्राम सचिव दिवाकर वर्मा और कंसल्टेंट इंजीनियर सबी जेहरा ने मिलकर नियमों और प्रक्रिया को दरकिनार कर भुगतान कराए। कई मामलों में न तो कार्यस्थल स्पष्ट है और न ही बिलों पर कोई वैधानिक प्रमाण मौजूद है।

सबसे चौंकाने वाला मामला जूनियर हाईस्कूल कजपुरा से जुड़ा है। यहां मेसर्स आरुषि इंटरप्राइजेज का 29,576 रुपये का बिना तिथि वाला बिल दर्शाया गया है, जबकि भुगतान पूरे 39,295 रुपये का किया गया। बिल और भुगतान राशि के बीच का यह अंतर सीधे वित्तीय गड़बड़ी की ओर संकेत करता है।

इसी तरह हैंडपंप रिबोर के नाम पर 41,904 रुपये का भुगतान दिखाया गया है, लेकिन कागजों में कार्यस्थल जूनियर विद्यालय और जमीनी हकीकत में सार्वजनिक स्थान बताया जा रहा है। इससे यह भी साफ नहीं हो पा रहा है कि हैंडपंप वास्तव में कहां लगाया गया।

रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों से हर महीने 10,000 से 38,000 रुपये तक के भुगतान लगातार किए जाते रहे हैं। कभी 18,975 रुपये, कभी 37,890 रुपये, तो कभी 19,167 रुपये का भुगतान दिखाया गया, जिससे यह संदेह और गहराता है कि पंचायत में नियमित रूप से अनियमितताएं हो रही हैं।

मनरेगा कार्यों में भी गंभीर गड़बड़ियों के आरोप हैं। मिट्टी पटाई के नाम पर 18,500 रुपये का भुगतान दिखाया गया है, लेकिन कार्य स्थल का कोई स्पष्ट विवरण नहीं है। 12 ह्यूम पाइप लगाने का कार्य दर्शाया गया, जबकि बिल में 19 पाइप की एंट्री की गई है। इसके अलावा एक बंद जीएसटी नंबर वाली फर्म से भी बिल लगाए जाने का आरोप है।

वृक्षारोपण कार्य में पांच मजदूरों का उल्लेख है, जबकि फोटो में केवल चार लोग दिखाई दे रहे हैं। पंचायत सहायक और केयरटेकर के नौ महीने के मानदेय के रूप में 54,000 रुपये का भुगतान दर्शाया गया है, लेकिन इसमें भी न तो किसी के हस्ताक्षर हैं और न ही कोई स्पष्ट विवरण। इसके अलावा बिना कोई काम किए कंसल्टेंट इंजीनियर सबी जेहरा को 4,521 रुपये का भुगतान दिखाया गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां सरकार गांवों को स्मार्ट विलेज बनाने की बात कर रही है, वहीं कजपुरा में नालियों, इंटरलॉकिंग और अन्य विकास कार्यों का कोई ठोस प्रमाण नजर नहीं आता। कागजों में सब कुछ चमक रहा है, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन गंभीर आरोपों पर जिला प्रशासन कब संज्ञान लेगा और जांच कब शुरू होगी। क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल कजपुरा में विकास नहीं, बल्कि जांच का इंतजार चल रहा है।

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