Home Ayodhya/Ambedkar Nagar अयोध्या गेमिंग की लत बन रही मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा

गेमिंग की लत बन रही मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा

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◆ डोपामिन के प्रभाव से बढ़ता आकर्षण, समय रहते परामर्श जरूरी


अयोध्या। मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत अब बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गेम खेलने की आदत धीरे-धीरे नशे का रूप ले लेती है, जिससे व्यवहार में चिड़चिड़ापन, आक्रोश और अवसाद जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं।

डा आलोक मनदर्शन
मनो परामर्शदाता, जिला चिकित्सालय अयोध्या

जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने हाल ही में आयोजित जागरूकता वार्ता में बताया कि गेमिंग की लत के चार प्रमुख लक्षण होते हैं। पहला, व्यक्ति का लगातार गेम या उसी के बारे में सोचते रहना। दूसरा, गेम खेलने का समय लगातार बढ़ते जाना। तीसरा, गेम न खेलने पर बेचैनी और तनाव महसूस होना। चौथा, रोक-टोक या बाधा आने पर गुस्सा या आक्रामक व्यवहार दिखाना।

उन्होंने बताया कि ऐसे बच्चों में एकांतप्रियता, आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, उन्माद और आक्रामकता जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं। कई मामलों में यह स्थिति गंभीर मानसिक विकार का रूप ले सकती है, जिसे ‘ऑपोजिशनल डिफायंट डिसऑर्डर’ कहा जाता है। इसमें बच्चे डांट-फटकार पर अत्यधिक गुस्से की प्रतिक्रिया देते हैं।


कैसे लगती है लत


डॉ. मनदर्शन के अनुसार, गेम खेलने के दौरान दिमाग में ‘डोपामिन’ हार्मोन का स्राव होता है, जो रोमांच और खुशी का एहसास कराता है। यही अनुभव दिमाग में दर्ज हो जाता है और बार-बार उसी सुख की इच्छा पैदा करता है। जब यह इच्छा पूरी नहीं होती तो बेचैनी और आक्रामकता बढ़ जाती है। यह स्थिति पारंपरिक नशे की लत जैसी होती है, इसलिए इसे ‘डिजिटल ड्रग’ भी कहा जाने लगा है।


क्या करें अभिभावक


विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि वे बच्चों की गतिविधियों पर मैत्रीपूर्ण तरीके से नजर रखें और स्वयं भी संतुलित डिजिटल व्यवहार अपनाएं। परिवार में संवाद बढ़ाएं, बच्चों को खेलकूद और अन्य रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें।
जरूरत पड़ने पर ‘डिजिटल डिटॉक्स’, इंटरनेट से दूरी और मनोपरामर्श जैसी तकनीकों की मदद ली जा सकती है। यदि बच्चे में आक्रामक या असामान्य व्यवहार दिखे तो उसे नजरअंदाज न करें और समय पर विशेषज्ञ से सलाह लें।

उन्होंने कहा कि समय रहते जागरूकता और उपचार से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।

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