(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
कैंपटी फॉल की शीतल जलधारा में स्नान, प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का आनंद और पहाड़ों के बीच बिताए गए अविस्मरणीय क्षणों को अपनी स्मृतियों में संजोने के बाद हमारा काफिला पुनः मसूरी नगर की ओर बढ़ चला। पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर चलते हुए बार-बार मन पीछे छूटे कैंपटी फॉल की ओर लौट जाना चाहता था। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति हमें अपनी गोद से इतनी जल्दी विदा करने के लिए तैयार ही न हो। लेकिन यात्रा का अपना अनुशासन होता है और उसी का पालन करते हुए हम पहाड़ों की रानी मसूरी के सबसे प्रसिद्ध आकर्षण ‘माल रोड’ की ओर बढ़ते रहे।
शाम के लगभग चार बजे हमारा काफिला मसूरी के प्रसिद्ध माल रोड बाजार के निकट पहुंच गया। उस समय मौसम अत्यंत सुहावना था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और सूर्य पश्चिमी पर्वतों की ओर धीरे-धीरे ढल रहा था। उसकी सुनहरी किरणें सामने दिखाई दे रही पर्वत श्रृंखलाओं पर इस प्रकार बिखर रही थीं, मानो किसी चित्रकार ने अपनी तूलिका से पहाड़ों को स्वर्णिम रंगों से सजा दिया हो।
माल रोड पर निजी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित था। इसलिए सभी वाहन निर्धारित पार्किंग स्थल पर खड़े करने के लिए भेज दिए गए। वाहन चालकों को वहीं प्रतीक्षा करने के निर्देश दिए गए और तय हुआ कि हम सभी लोग पैदल माल रोड का भ्रमण करेंगे तथा निर्धारित समय पर पार्किंग में पहुंचकर हरिद्वार के लिए प्रस्थान करेंगे। वाहनों से उतरते ही सभी साथियों के चेहरे पर अलग ही उत्साह दिखाई दे रहा था।
इतिहास, प्रकृति और पर्यटन का अद्भुत संगम
महापौर जी और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजलक्ष्मी तिवारी जी सहित लगभग 40 सदस्यों का हमारा दल माल रोड की ओर बढ़ चला। भीड़ अधिक होने के कारण स्वाभाविक रूप से हम दस-बारह लोगों के छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हो गए। कोई दुकानों की ओर बढ़ा, कोई सीधे घाटियों की ओर खिंच गया तो कोई कैमरे में प्रकृति के अनुपम दृश्य कैद करने में व्यस्त हो गया।
मसूरी का माल रोड केवल एक बाजार नहीं, बल्कि इस पर्वतीय नगर की आत्मा है। अंग्रेजी शासनकाल में विकसित यह मार्ग आज भी अपनी ऐतिहासिक गरिमा, आधुनिक सुविधाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यहां टहलते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा भारत एक ही सड़क पर सिमट आया हो। देश के विभिन्न राज्यों से आए पर्यटक अपनी-अपनी भाषा में बातचीत कर रहे थे, लेकिन सभी के चेहरों पर एक जैसी प्रसन्नता झलक रही थी।
सड़क के दोनों ओर आकर्षक दुकानें सजी थीं। कहीं ऊनी वस्त्र, कहीं हस्तशिल्प, कहीं पहाड़ी मसाले, कहीं लकड़ी की कलात्मक वस्तुएं तो कहीं स्थानीय स्मृति-चिह्न पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। लगभग पंद्रह-बीस साथियों ने अपने परिवार और मित्रों के लिए स्मृति-चिह्न खरीदे। किसी ने पहाड़ी टोपी ली, किसी ने ऊनी शॉल, किसी ने हस्तनिर्मित सजावटी वस्तुएं, तो किसी ने केवल इस यात्रा की याद को संजोने के लिए छोटी-सी निशानी खरीद ली। यात्राओं की यही छोटी-छोटी स्मृतियां बाद में जीवन भर उन सुनहरे दिनों की याद दिलाती रहती हैं।
इस दौरान सबसे अधिक आकर्षित करने वाला दृश्य था माल रोड से दिखाई देने वाली पर्वत श्रृंखलाएं और गहरी घाटियां। सड़क के किनारे लगी रेलिंग के पास खड़े होकर नीचे झांकते तो दूर-दूर तक फैली हरियाली मन को मोह लेती थी। कहीं चीड़ और देवदार के वृक्ष मंद हवा के साथ झूम रहे थे तो कहीं बादलों की हल्की चादर पहाड़ियों को अपने आगोश में समेटे हुए थी।
घाटियों के सौंदर्य और साथियों की आत्मीयता ने शाम को बनाया यादगार
-मेरे साथ चल रहे इं. रवि तिवारी जी, दीपक शुक्ल जी, चंद्रशेखर तिवारी जी, प्रवीण सिंह जी, अनुजेंद्र तिवारी जी सहित सभी साथियों के लिए यह दृश्य किसी स्वप्न से कम नहीं था। मैदानी क्षेत्र में रहने वाले हम लोगों के लिए इतनी ऊंचाई से प्रकृति का विराट स्वरूप पहली बार इतने निकट से देखने का अवसर मिला था। हर कोई कुछ देर ठहरकर उस अद्भुत सौंदर्य को अपनी आंखों और मन में उतार लेना चाहता था।
भ्रमण के दौरान हंसी-मजाक का सिलसिला भी लगातार चलता रहा। कोई किसी की तस्वीर खींच रहा था तो कोई सेल्फी लेने में व्यस्त था। इसी बीच चंद्रशेखर तिवारी जी ने आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई और अनुजेंद्र तिवारी जी ने सभी को पास की दुकान पर आमंत्रित कर दिया। उधर इं. रवि तिवारी जी चाय के पक्ष में अपनी दलील देते रहे। अंततः ठंडी पहाड़ी हवा के बीच आइसक्रीम का स्वाद लेना भी अपने आप में एक अलग और यादगार अनुभव बन गया।
चाय की चुस्कियों के साथ यादों में बस गई मसूरी की शाम
आइसक्रीम का आनंद लेने के बाद हम आगे बढ़े ही थे कि महापौरजी का फोन आया। उन्होंने सभी साथियों को वापस लौटकर बाईं ओर स्थित उडूपी रेस्टोरेंट पहुंचने के लिए कहा। लगभग दस मिनट के भीतर सभी साथी वहां एकत्र हो गए। हमारे लिए चाय और बिस्कुट पहले से ही तैयार थे। पहाड़ी मौसम में चाय की हर चुस्की शरीर ही नहीं, मन को भी नई ऊर्जा से भर रही थी।
कुछ देर बाद मैं भी अन्य साथियों की तरह एक पत्थर की शिला पर बैठकर उस मनोरम वातावरण का आनंद लेने लगा। सामने पर्वत थे, नीचे गहरी घाटियां थीं और चारों ओर अपनेपन से मुस्कुराते साथी। उस क्षण ऐसा लगा कि जीवन की वास्तविक खुशियां शायद इन्हीं सरल, सहज और आत्मीय पलों में छिपी होती हैं।
इसी आनंदमय वातावरण में समय कब बीत गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। जब सूर्य की अंतिम किरणें पर्वतों के पीछे विलीन होने लगीं और मसूरी की शाम रंग-बिरंगी रोशनी में निखरने लगी, तब हमें हरिद्वार लौटने की तैयारी करनी पड़ी। मन तो वहीं ठहर जाने का था, लेकिन यात्रा अभी शेष थी और नई मंजिलें हमारा इंतजार कर रही थीं।