◆ बादलों के बीच वन सम्पदा, पहाड़ियों एवं जल प्रपातों से साक्षात्कार
हरिद्वार में बिताया गया पिछला दिन आस्था और आध्यात्मिक अनुभूतियों से परिपूर्ण रहा। मां चंडी देवी और मां मनसा देवी के दर्शन तथा हर की पैड़ी की भव्य गंगा आरती ने मन को ऐसी शांति प्रदान की थी, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। … लेकिन हमारी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी। अगले दिन हमें उत्तराखंड की उस रमणीय धरती की ओर प्रस्थान करना था, जिसे पूरे देश में “पहाड़ों की रानी” मसूरी के नाम से जाना जाता है।

कार्यक्रम के अनुसार सभी साथियों को प्रातः छह बजे तक अपने-अपने कमरों से बाहर निकलकर होटल के हॉल में एकत्र होना था, ताकि समय से मसूरी के लिए प्रस्थान किया जा सके। यात्रा का उत्साह ऐसा था कि अधिकांश साथी छह बजने से पहले ही जाग चुके थे। कोई मोबाइल की बैटरी जांच रहा था, कोई वस्त्र समेट रहा था। भास्कर शुक्ल, मनोज श्रीवास्तव, सुबोध चतुर्वेदी, इंद्रजीत शुक्ल और विष्णु यादव साथियों को जल्दी तैयार होने की याद दिला रहे थे।

सुबह लगभग साढ़े छह बजे तक अधिकांश साथी होटल के भूतल पर पहुंच चुके थे। अब तक महापौर के साथ चल रहे विष्णु मौर्य की एक क्लिक ने लोगो के मन में यात्रा का रोमांच भर दिया। होटल प्रबंधन ने चाय और नाश्ते में गरमागरम छोला, पोहा व आम की व्यवस्था की थी। पहाड़ों की ओर लंबी यात्रा से पहले हल्का, लेकिन स्वादिष्ट नाश्ता चाय के साथ सभी के लिए उपलब्ध था। चाय की चुस्कियों के साथ अगले पड़ाव की चर्चा भी चल रही थी। कोई मसूरी के मौसम की बात कर रहा था तो कोई कैंपटी फॉल में स्नान की योजना बना रहा था।
नाश्ता समाप्त होते ही सभी अपने-अपने वाहनों में सवार हो गए। तीनों वाहन एक के पीछे एक खड़े थे। महापौर गिरीशपति त्रिपाठी जी तथा वशिष्ठ फाउंडेशन की महासचिव एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजलक्ष्मी तिवारी जी के नेतृत्व में ठीक सात बजे हमारा काफिला नीलकंठ होटल से मसूरी की ओर रवाना हो गया।
हम लोग महज आठ-10 किलोमीटर गए होंगे कि धीरे-धीरे हरिद्वार नगर पीछे छूटन लगा और देहरादून की पर्वत श्रृंखलाएं हमारा स्वागत करने लगीं। कुछ ही समय बाद हम मुख्य मार्ग पर थे। जैसे-जैसे वाहन आगे बढ़ते गए, प्रकृति का स्वरूप बदलता गया। मैदानी रास्तों की जगह घुमावदार सड़कें दिखाई देने लगीं। सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली, ऊंचे-ऊंचे पेड़ और पहाड़ों से उतरते छोटे-छोटे जलस्रोत यात्रा को और भी मनोहारी बना रहे थे।
कहीं पानी चट्टानों से टकराकर मधुर संगीत उत्पन्न कर रहा था तो कहीं वह सड़क के किनारे बहते हुए अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था। ऐसे मनोरम दृश्यों को देखकर हमारे चालक भी स्वयं वाहन रोक देते और हम सभी कुछ देर प्रकृति का आनंद लेते। समूह के लगभग प्रत्येक सदस्य ने इन स्थानों पर स्मृति-चित्र और सेल्फियां लीं। आखिर यात्रा की यादें केवल मन में ही नहीं, कैमरे में भी सहेजनी थीं।




