अयोध्या। ऐतिहासिक चौक क्षेत्र अब हर रविवार जाम के महोत्सव का भव्य आयोजन स्थल बन चुका है। जैसे ही शाम होती है, चौक की सड़कें “सिकुड़ने“ की रस्म निभाने लगती हैं और वाहन रेंगने की प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लगते हैं।
यहां ई-रिक्शा चालकों की अपनी ही सरकार है। उन्होंने सड़कों पर अघोषित स्टैंड बना लिए हैं और ट्रैफिक नियमों को “रिक्शा के टायर“ से कुचलकर आगे बढ़ते हैं। उनकी नजर में सड़कें सिर्फ सवारी चढ़ाने-उतारने का मंच हैं। ट्रैफिक रुके, जनता फंसे, इन्हें क्या फर्क पड़ता है?
स्थानीय दुकानदार जब इनसे किनारे खड़े होने की विनती करते हैं, तो मानो ये विनती नहीं, युद्ध का आमंत्रण हो। बहस और झगड़े को ये अपनी ड्यूटी का हिस्सा मानते हैं।
रविवार को जाम की महिमा इतनी बढ़ी कि खुद शहर कोतवाल अश्विनी पांडेय का वाहन भी इसकी कृपा से नहीं बच सका। वाहन जाम में फंसा तो कोतवाल साहब को खुद उतरकर मोर्चा सभालना पड़ा। तब जाकर चौक पर तैनात सुरक्षा कर्मियों की नींद खुली और वे अचानक “सक्रिय“ हो उठे।
सड़कें हैं या बाजार का विस्तार कहना मुश्किल है। दुकानदारों ने फुटपाथ क्या, आधी सड़क तक अपने व्यापार का साम्राज्य फैला रखा है। प्रशासन की आंखों पर पट्टी नहीं, शायद धूप का चश्मा लगा है जिससे अतिक्रमण नजर ही नहीं आता। हर शाम चौक की सड़कें आम जनता से कहती हैंः समय लेकर निकलो, क्यों कि जाम हमारी परंपरा है। प्रशासन के लिए भी यह सब शायद रूटीन है देखो, सहो और चुप रहो।