अयोध्या से पूर्णागिरी का सौंदर्य , रिश्तों की गर्माहट, प्रकृति का सान्निध्य और यादों से भरा सफर
✍️ मुकेश पांडे की कलम से
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का साधन नहीं होतीं, वे मनुष्य को लोगों, प्रकृति और स्वयं से जोड़ने का माध्यम भी बनती हैं। कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जो अपने गंतव्य से अधिक रास्ते की वजह से याद रह जाती हैं। दुधवा राष्ट्रीय उद्यान होते हुए उत्तराखंड के चंपावत जनपद स्थित अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंखला की चोटी पर 51 शक्तिपीठों में शामिल पूर्णागिरि की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही, जिसमें तराई की हरियाली, पहाड़ का अद्भुत वैभव, पुराने मित्रों का स्नेह देखने को मिला।पत्रकारिता के दिनों की स्मृतियाँ भी जीवंत हो उठीं।
गुरुवार का दिन था। महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी जी के सरकारी आवास पर मित्रों के बीच सामान्य चर्चा चल रही थी कि फैजाबाद अब अयोध्या के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं अभिन्न मित्र दीपक शुक्ल ने अचानक दुधवा वन्य जीव प्रभाग घूमने की इच्छा व्यक्त की। जून की तपती गर्मी और मानसून के आगमन की दस्तक को देखते हुए पहले मन में विचार आया कि इस समय ऐसी यात्रा टाल दी जाए, लेकिन कहते हैं कि ईश्वर की इच्छा, अच्छे साथ के सामने संकोच अधिक देर टिक नहीं पाता। दीपकजी के आग्रह और उनके उत्साह ने मन बदल दिया और देखते ही देखते दुधवा की यात्रा का निर्णय पक्का हो गया।
मित्रों का साथ बनी यात्रा की बड़ी ताकत




