◆ जिला महिला अस्पताल में स्वीकृत 16 पद की जगह चार डाक्टर की है तैनाती
◆ डाक्टरों की कमी के कारण इलाज की गुणवक्ता व गति दोनो हो रही है प्रभावित
अयोध्या। सरकारी अस्पतालों में प्रसव की संख्या बढ़ाना सरकार के साथ स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताओं में रहता है। जननी सुरक्षा योजना समेत कई योजनाएं प्रसूताओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए सरकार ने लागू की है। लगातार प्रयास के बाद भी सरकार की मंशा जिला महिला अस्पताल में शत प्रतिशत पूरी नहीं हो सकती है, इसका कारण यहां चिकित्सकों की भारी कमी है। यहां स्वीकृत पद के सापेक्ष केवल 30 प्रतिशत चिकित्सकों की तैनाती है, जिसके कारण यहां पर तैनात डाक्टरों के लगातार काम करने के बाद भी कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है।
इसके लिए लगातार प्रयास हुए। जिम्मेदारों से मांग की गई। कई बार आश्वासन भी मिला। लेकिन चिकित्सको की कमी दूर नहीं हुई। यह तब है जब जिला महिला चिकित्सालय में अगल बगल जनपदों के मरीज भी उपचार के लिए आते रहते है। 268 बेड की सुविधा वाले इस अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ के 16 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल चार डॉक्टर ही तैनात हैं। इसी तरह निश्चेतक (एनेस्थेटिस्ट) के पांच पदों में सिर्फ एक डॉक्टर कार्यरत है। पैथालॉजिस्ट के दो पदों में एक, रेडियोलॉजिस्ट के दो में एक और बाल रोग विशेषज्ञ के तीन पदों में एक नियमित तथा दो संविदा चिकित्सक ही उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों की इस कमी के चलते इलाज की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हो रही हैं। जिला महिला अस्पताल में मदर एंड चाइल्ड केयर विंग में 100 बेड, 20 बेड की बाल चिकित्सा गहन देखभाल इकाई (पीआईसीयू) और पुराने भवन में 168 बेड की व्यवस्था है। इतने सारे संसाधन होने के बाद केवल चिकित्सक की कमी से उपचार में दिक्कतें होती है। जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डा. विभा कुमारी का कहना है कि जिला महिला अस्पताल में कोई भी समस्या नहीं है। जनता हमारे उपर विश्वास रखे। हम उनकी हर अपेक्षा में खरें उतरेंगे।
महीनें औसतन 400 प्रसव व प्रतिदिन ओपीडी में आते है 250 मरीज
चिकित्सको की कमी के बावजूद महिला अस्पताल में बड़ी संख्या में प्रसव व ओपीडी में उपचार होता है। अस्पताल में हर महीने लगभग 350 से 400 प्रसव होते हैं, जबकि प्रतिदिन औसतन 250 मरीज ओपीडी में परामर्श के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा 90 से 125 महिलाओं का अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है। लेकिन चिकित्सको की सीमित संख्या के कारण मरीजों को इंतजार व लम्बी लाइन से गुजरने पर मजबूर कर देती है। इसके साथ में यहां तैनात चिकित्सको पर दबाव बना रहता है।