अयोध्या। सहकारिता भारतीय संस्कृति और संस्कार का अभिन्न हिस्सा रही है। वैदिक काल से ही सामूहिकता और परस्पर सहयोग की भावना भारतीय जीवन पद्धति का आधार रही है। यह बात सहकार भारती के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अरुणकुमारसिंह ने शनिवार को साकेत निलयम में आयोजित सहकार भारती के अयोध्या विभाग के दो दिवसीय अभ्यास वर्ग के उद्घाटन सत्र में कही।
उन्होंने कहा कि ऋग्वेद के दशम मंडल के सूक्त 191 का अंतिम मंत्र “संगच्छध्वंसंवदध्वंसंवोमनांसिजानताम्” संगठन और एकता की भावना को प्रकट करता है। इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद के “सहनाववतु, सहनौभुनक्तु, सहवीर्यंकरवावहै” मंत्र में भी सहकार की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि जब सहकारिता हमारी संस्कृति और संस्कार में पहले से विद्यमान थी, तब संगठन की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि समय के साथ इस भावना में कमी आने लगी। जो सहकार कभी समाज की समृद्धि का आधार था, वह धीरे-धीरे कमजोर हुआ। उन्होंने बताया कि सहकारिता को संस्थागत स्वरूप देने का प्रयास सरकार की ओर से वर्ष 1905 में किया गया।
उन्होंने कहा कि सहकारभारतीकाउद्देश्यभारतीयसहकारिताकीमूलभावनाकोपुनर्जीवितकरतेहुएसमाजकल्याणकेलिएसहकारिताकीशुद्धि, शुद्धिसेवृद्धिऔरवृद्धिसेसमृद्धि के लक्ष्य को साकार करना है। इसके लिए सहकारिता के क्षेत्र में संस्कारवान कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है। अभ्यास वर्ग का उद्देश्य कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने के साथ ही उन्हें सहकारिता के क्षेत्र का आवश्यक ज्ञान प्रदान कर आगे बढ़ाना है।
दो दिवसीय अभ्यास वर्ग में अयोध्या विभाग के अयोध्या, अंबेडकरनगर, बाराबंकी, सुल्तानपुरऔरअमेठी जिलों के करीब सौ कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं।
कार्यक्रम में प्रदेश महामंत्री अरुणदुबे, प्रदेश मंत्री कैलाशनाथनिषाद, प्रदेश उपाध्यक्ष डीपीपाठक और कोषाध्यक्ष शिवेंद्रप्रतापसिंह ने भी अपने विचार रखे। अतिथियों का स्वागत विभाग प्रमुख पंकजशर्मा ने किया, जबकि उद्घाटन सत्र का संचालन अयोध्या महानगर अध्यक्ष सुनीलकुमारपांडेय ने किया। दीपागुप्ता ने सहकार गीत प्रस्तुत किया। इस अवसर पर श्रीनिधि क्रेडिट सोसायटी के सभापति राजेशशर्मा सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित रहे।