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बीन की धुन पर नहीं, मादा को रिझाने के लिए नाचता है नाग

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अयोध्या। नाग पंचमी की पूर्व संध्या पर सांपों से जुड़े कई प्रचलित भ्रम और उनके वैज्ञानिक तथ्यों को लेकर जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि सांपों को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं हैं, जबकि इनके व्यवहार के पीछे वैज्ञानिक कारण होते हैं।

डॉ. आलोक मनदर्शन ने बताया कि इंडियन कोबरा बाहरी ध्वनि की तुलना में जमीन और आसपास के कंपन को अधिक महसूस करता है। सांप के बाहरी कान नहीं होते। खतरा महसूस होने पर कोबरा फन फैलाकर झपटने की मुद्रा में आ जाता है। सपेरे की बीन की दिशा में उसके शरीर की गतिविधि को अक्सर संगीत पर नृत्य समझ लिया जाता है।

उन्होंने कहा कि सांपों में इंसानों जैसी स्मृति और बदले की भावना नहीं होती। इसलिए नाग द्वारा किसी व्यक्ति की पहचान कर बाद में बदला लेने की धारणा वैज्ञानिक आधार नहीं रखती।

दूध पिलाने की परंपरा पर उन्होंने कहा कि सांप दूध को सामान्य आहार की तरह पचा नहीं सकते। पानी की कमी या भ्रम की स्थिति में वे दूध ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन यह उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है। नाग को दूध पिलाना उसकी जान के लिए खतरा बन सकता है।

उन्होंने बताया कि प्रजनन काल में नर नाग मादा को आकर्षित करने के लिए विशेष गतिविधियां करते हैं। कई बार नर आपस में संघर्ष भी करते हैं। मादा अंडे देती है और कुछ प्रजातियों में नर-मादा के व्यवहार में संतानों की सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियां भी देखी जाती हैं।

डॉ. मनदर्शन ने बताया कि सर्प-विष से एंटी-वेनम तैयार किया जाता है। इसके लिए विष की नियंत्रित मात्रा का इस्तेमाल कर पशुओं में एंटीबॉडी विकसित कराई जाती हैं। बाद में इन्हें शुद्ध करके एंटी-वेनम तैयार किया जाता है। उन्होंने सर्प-विष के नशे में इस्तेमाल की बात को लेकर भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई और कहा कि इसे लेकर प्रचलित दावों को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि भारत में सांपों की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें कोबरा, करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर को प्रमुख विषैले सांपों में गिना जाता है। नाग पंचमी के अवसर पर सांपों के प्रति आस्था के साथ उनके संरक्षण और सुरक्षित व्यवहार के प्रति जागरूकता भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सर्पदंश की स्थिति में झाड़-फूंक या घरेलू उपचार के बजाय तत्काल अस्पताल पहुंचना चाहिए। समय पर उचित चिकित्सा मिलने से सर्पदंश से होने वाली मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

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