◆ आस्था, रोमांच और हिमालय की गोद का अलौकिक अनुभव
शांतिकुंज परिसर से निकलकर कुछ ही देर में हमारा काफिला हरिद्वार नगर की सीमा पार कर शिवालिक पर्वतमाला की ओर बढ़ चला। रास्ते में विकासजी ने मां चंडी देवी मंदिर के इतिहास और महिमा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि यह मंदिर शिवालिक पर्वतमाला के पूर्वी भाग में स्थित नील पर्वत पर अवस्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 950 से 1000 मीटर (करीब 3,100–3,300 फीट) मानी जाती है। अनेक लोग इसे लगभग पाँच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मानते हैं। ऊंचाई चाहे जितनी हो लेकिन हिमालय पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर श्रद्धा, विश्वास और प्रकृति के सौंदर्य का अद्भुत संगम है।

मान्यता है कि यहीं देवी चंडी ने दैत्य सेनापति चंड और मुंड का संहार किया था। इन्हीं दोनों असुरों के वध के कारण माता को “चंडी” नाम प्राप्त हुआ। देवी की इस विजय का उल्लेख दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक दर्शन करने से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
लगभग बीस मिनट की यात्रा के बाद हमारा दल चंडी देवी मंदिर तक पहुँचने के लिए रोपवे के प्रवेश द्वार पर पहुंच गया। पर्वत की ऊंचाई देखकर कुछ साथी पैदल चढ़ने की चर्चा करने लगे। यहाँ बताया गया कि यदि कोई पैदल मार्ग से जाए तो लगभग तीन किलोमीटर की चढ़ाई तय करनी पड़ती है, जिसमें सामान्यतः ढाई से तीन घंटे का समय लग जाता है। रास्ता लगातार चढ़ाई वाला है और गर्मी के दिनों में यह यात्रा काफी कठिन होती है। दूसरा विकल्प रोप-वे के इस्तेमाल का था, जिसे स्थानीय लोग प्रेम से “उड़न खटोला” भी कहते हैं। महापौर ने रोपवे को बेहतर माना और सभी साथियों को रोपवे से ले जाने का निर्णय लिया। टिकट लेने के बाद हम सभी अपनी-अपनी ट्रॉली में बैठ गए। हर ट्राली में चार-चार लोगों के बैठने की सुविधा थी। जैसे ही ट्रॉली धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी, हरिद्वार का मनोरम दृश्य आंखों के सामने आने लगा। नीचे गंगा की निर्मल धारा चांदी की रेखा की तरह चमक रही थी। मंदिर के शिखर और दूर-दूर तक फैली शिवालिक पहाड़ियों की हरियाली और ऊँची चोटी मन को मोह रही थी।

लगभग दस मिनट की इस रोमांचक यात्रा ने सभी का मन जीत लिया। कुछ साथी पहली बार रोपवे में बैठे थे, इसलिए उनके चेहरे पर उत्साह और हल्की घबराहट दोनों दिखाई दे रही थीं। किशोरों के लिए यह किसी रोमांचक खेल से कम नहीं था। रोपवे स्टेशन पर उतरने के बाद मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ दूरी पैदल तय करनी होती है। यहां सामान्यतः 200 से 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। कुछ स्थानों पर समतल मार्ग भी है, लेकिन अंतिम हिस्सा सीढ़ियों वाला है। हम सबने धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ना शुरू किया। दोनों ओर प्रसाद, चुनरी, नारियल और माता की तस्वीरें बेचने वाली छोटी-छोटी दुकानें थीं। वातावरण में “जय माता दी” के जयकारे लगातार गूंज रहे थे। कहीं घंटियों की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी तो कहीं भजन बज रहे थे।

चार-पांच मिनट बाद हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंच चुके थे। सभी ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद, नारियल और लाल चुनरी खरीदी। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही मन स्वतः शांत हो गया। माता के दिव्य स्वरूप के दर्शन करते समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो सारी थकान क्षणभर में समाप्त हो गई हो। गिरीशपतिजी को सपरिवार गर्भग्रह के भीतर ले जाया गया। उन्होंने स्वकल्याण के साथ राष्ट्र कल्याण की कामना की।यहाँ हम सभी ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। माता के चरणों में चुनरी अर्पित की और अपने-अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। कुछ साथियों ने व्यक्तिगत मनोकामनाएं भी माता के चरणों में समर्पित कीं।
मंदिर परिसर में अनेक श्रद्धालु चुनरी बांधते हुए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति का संकल्प ले रहे थे। दीपक शुक्ल, मनोज श्रीवास्तव व हमने भी चुनरी बांधी, कई अन्य साथियों ने भी। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से यहां मांगी गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है और मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु पुनः माता के दरबार में आकर धन्यवाद अर्पित करते हैं। दर्शन के उपरांत कुछ देर हम सभी मंदिर परिसर में बैठे। पर्वत की ऊंचाई से दिखाई देता हरिद्वार का विहंगम दृश्य किसी चित्रकार की उत्कृष्ट कृति जैसा प्रतीत हो रहा था। दूर बहती गंगा, उसके किनारे बसे घाट और चारों ओर फैली हरियाली मन को अद्भुत शांति प्रदान कर रही थी। वापसी के समय विकास तिवारी जी ने एक और सुखद अनुभव हमारी यात्रा में जोड़ दिया। उन्होंने सभी साथियों को यहां की प्रसिद्ध ठंडी लस्सी पिलाई। पर्वत की चढ़ाई के बाद यह लस्सी तृप्ति का बोध करने वाली लगी। सभी साथी इसके स्वाद की चर्चा करते रहे।
रोपवे से नीचे लौटते समय एक रोचक दृश्य ने ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इंजीनियर रवि तिवारी जी और ज्योतिषाचार्य दीपक शुक्ला जी की नजर सामने पहाड़ की चट्टानों के बीच उभरी एक प्राकृतिक आकृति पर पड़ी। वह आकृति दूर से विशाल नागराज के फन जैसी दिखाई दे रही थी। उन्होंने उत्साहित होकर हम सभी को भी वह दृश्य दिखाया। सचमुच प्रकृति ने चट्टानों को इस प्रकार आकार दिया था कि ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं नागराज वासुकी पर्वत पर विराजमान होकर माता के दरबार की रक्षा कर रहे हों।
उस क्षण मन में सहज ही विचार आया कि मां चंडी के दर्शन के साथ मानो भगवान शिव के प्रिय नागराज के भी दर्शन हो गए। शिव और शक्ति का यह अद्भुत संगम हमारी यात्रा को और अधिक आध्यात्मिक बना गया। सभी साथी उस दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करने लगे। प्रकृति कभी-कभी ऐसे दृश्य रच देती है जिन्हें शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं होता। नीचे पहुंचते-पहुंचते सांझ की आहट महसूस होने लगी थी। पर्वत से उतरकर जब हमने पीछे मुड़कर मां चंडी देवी मंदिर की ओर देखा तो लगा जैसे पूरी पहाड़ी माता की दिव्य आभा से आलोकित हो उठी हो।



