अम्बेडकर नगर। आधुनिक चिकित्साशास्त्र और विज्ञान भले ही मनुष्यों को जैविक प्राणी मानकर उनपर नानाप्रकार के प्रयोगों को करता हो किंतु सनातन भारतीय वांग्मय और जीवन पद्धति में मनुष्य को केवल जैविक प्राणी नहीं बल्कि संस्कार और चेतना से युक्त व्यक्तित्व माना गया है। इसलिए यहाँ ज्ञान, अनुभव और आयु में श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करना नैतिक कर्तव्य समझा गया है। यही कारण है कि भारतीय जीवन-पद्धति में चरणस्पर्श को सम्मान और आशीर्वाद प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम माना गया है।
अपने से बड़ों,श्रेष्ठों और पूज्यजनों के स्वागत,सत्कार और उनके प्रति सम्मान ज्ञापित करने हेतु जहां भारतीय सभ्यता में नमस्ते,नमस्कार और प्रणाम तो इस्लाम में सलामवालेकुम और ईसाइयत में भी हैलो,बौद्धों में नमो बुद्धाय और सिखों में सत श्री अकाल आदि का स्पष्ट उल्लेख और प्रयोग मिलता है। किंतु सनातन परम्परा में जिस तरह पूर्ण वैज्ञानिकता के साथ चरणस्पर्श की महिमा का वर्णन किया गया है,वैसा विश्व में अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देता है।अलबत्ता बौद्ध,सिख, जैन जोकि तीनों ही सत्य सनातन की ही विचारधाराएं और पंथ हैं,में भी चरणस्पर्श को सनातन जैसा ही सम्मान प्राप्त है।
भारतीय धर्मग्रंथों में माता-पिता और गुरु को देवतुल्य स्थान दिया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् में स्पष्ट रूप से कहा गया है—
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।”
अर्थात माता, पिता और आचार्य को देवतुल्य मानकर उनका आदर करना चाहिए। इस आदर का व्यावहारिक रूप चरणस्पर्श की परंपरा में प्रकट होता है।श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी गुरु महिमा का वर्णन करते हुए चरणस्पर्श का बड़ा ही सुंदर वर्णन करते हुए लिखते हैं कि –
श्रीगुरूपद नख मनिगन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।
महान कृष्णभक्त रसखान ने तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने सखा सुदामा के चरणों को अश्रुओं से धोने का वर्णन करते हुए लिखा है कि –
देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिके करुणानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं ,नैनन के जल सो पग धोए।।
मनुस्मृति में भी बड़ों के अभिवादन का महत्व बताते हुए कहा गया है—
“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥”
अर्थात जो व्यक्ति सदा बड़ों का अभिवादन करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है।
महाकाव्यों में भी इस परंपरा के अनेक उदाहरण मिलते हैं। रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा गुरु वशिष्ठ, माता कौशल्या और अन्य वयोवृद्धों के चरणों का स्पर्श कर आशीर्वाद लेने का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार महाभारत में पांडवों द्वारा भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य के चरणों का स्पर्श कर सम्मान प्रकट किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि चरणस्पर्श भारतीय संस्कृति की अत्यंत प्राचीन और व्यापक परंपरा रही है।
भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य का शरीर केवल भौतिक तत्वों का समूह नहीं है, बल्कि यह चेतना और प्राणशक्ति का भी केंद्र है। योगशास्त्र में वर्णित नाड़ी-तंत्र के अनुसार शरीर में प्राण ऊर्जा विभिन्न मार्गों से प्रवाहित होती रहती है।जब कोई व्यक्ति श्रद्धा और विनम्रता के साथ किसी वरिष्ठ के चरणों का स्पर्श करता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से उनके अनुभव, ज्ञान और आशीर्वाद को स्वीकार करता है। इस प्रकार चरणस्पर्श केवल शारीरिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मिक समर्पण और संस्कार की अभिव्यक्ति है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में हाथों और पैरों के सिरों पर असंख्य तंत्रिका अंत होते हैं। ये तंत्रिकाएँ शरीर के विभिन्न अंगों से जुड़ी होती हैं। जब कोई व्यक्ति दोनों हाथों से किसी के चरणों का स्पर्श करता है और सामने वाला व्यक्ति उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता है, तो एक प्रकार का जैव-ऊर्जा परिपथ बनता है।यह परिपथ शरीर की तंत्रिका प्रणाली को सक्रिय करता है और मानसिक शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कराता है।
इसके अतिरिक्त आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों जैसे रिफ्लेक्सोलॉजी और एक्यूप्रेशर में भी यह माना गया है कि पैरों के विभिन्न बिंदुओं का संबंध शरीर के अनेक अंगों से होता है। इन बिंदुओं को स्पर्श करने या दबाने से शरीर में ऊर्जा का संतुलन और तंत्रिका तंत्र की सक्रियता बढ़ती है।
चरणस्पर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव व्यक्ति के मन और व्यक्तित्व पर पड़ता है। यह क्रिया मनुष्य के भीतर अहंकार का क्षय और विनम्रता का विकास करती है।
जब कोई व्यक्ति झुककर किसी बड़े का सम्मान करता है तो उसके भीतर कृतज्ञता, श्रद्धा और अनुशासन की भावना उत्पन्न होती है। मनोविज्ञान के अनुसार ऐसे संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व को संतुलित और सामाजिक जीवन के लिए अधिक उपयुक्त बनाते हैं।भारतीय समाज में चरणस्पर्श केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का भी आधार है। यह परंपरा पीढ़ियों के बीच सम्मान, संवाद और सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखती है।
बड़ों द्वारा दिए गए आशीर्वाद—जैसे “आयुष्मान भव”, “चिरंजीवी भव”, “विद्यावान भव”—के माध्यम से सकारात्मक भावनाएँ और शुभकामनाएँ नई पीढ़ी तक पहुँचती हैं। इससे परिवार और समाज में स्नेह, अनुशासन और संस्कारों की परंपरा जीवित रहती है।
इस प्रकार भारतीय वाङ्मय में वर्णित चरणस्पर्श की परंपरा केवल धार्मिक आचार नहीं बल्कि गहरे दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक आधारों पर आधारित है। यह परंपरा विनम्रता, सम्मान, सकारात्मक ऊर्जा और सामाजिक समरसता का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है।भारतीय संस्कृति का यह संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि ज्ञान, अनुभव और आयु में श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा और विनम्रता ही जीवन को संतुलित, समृद्ध और संस्कारित बनाती है। चरणस्पर्श इसी महान सांस्कृतिक दृष्टि का जीवंत प्रतीक है।