अम्बेडकर नगर। उर्दू ग़ज़ल को महज़ अदबी दायरों से निकालकर आम आदमी के दिल तक पहुँचाने वाले जिले की धरती पर पैदा होने वाले पद्मश्री, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के पूर्व अध्यक्ष व महान शायर डॉ.बशीर बद्र की याद में बज़्मे सुख़न बसखारी के तत्वाधान में रविवार रात आजमगढ़ रोड स्थित नरगिस प्लाजा बसखारी में “एक शाम डॉ.बशीर बद्र के नाम”शीर्षक से आयोजित कार्यक्रम के संयोजक कुमैल अहमद सिद्दीकी, चिकित्सक डॉक्टर शोएब अख्तर की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम का संचालन सितारे उर्दू अवार्ड से सम्मानित मोहम्मद शफी नेशनल इंटर कॉलेज हंसवर के शिक्षक मोहम्मद असलम खान ने किया। अध्यक्षता कर रहे डॉ.शुऐब अख्तर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ.बशीर बद्र ने अपनी नफासत भरी शायरी और बेहद सरल अंदाज के कारण गजल को सिर्फ साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया। कुमैल अहमद सिद्दीकी ने कहा कि बशीर बद्र की गजलों में रिश्तों की गर्माहट, बिछड़ने का दर्द, अकेलेपन की टीस और जिंदगी की सादगी बेहद खूबसूरती से झलकती थी।यही वजह रही कि उनकी पंक्तियां मुशायरों से निकलकर लोगों की जुबान और दिलों तक पहुंचीं। शिक्षक मोहम्मद असलम खान ने कहा कि उर्दू शायरी को आसान और बोलचाल की भाषा में नई पहचान देने वाले बशीर बद्र उन शायरों में रहे, जिनके शेर साहित्यिक महफ़िलों से निकलकर आम लोगों की ज़बान तक पहुंचे। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों, बिछड़ने का गम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के अनुभव दिखाई देते थे।शायरा चांदनी मुस्कान महाराष्ट्र, शगुफ्ता लखनवी, इंसाफ टांडवी, अहमद सईद टांडवी, मतलूब टांडवी, कुमैल डोंडवी, अबूसाद भूलेपुरी,अकरम भूलेपुरी,कमर जीलानी टांडवी,मजाहिर टांडवी, रिजवान टांडवी व अन्य शायरों व कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की।कुमैल डोंडवी ने बशीर बद्र के मशहूर शेर कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो”पढ़कर खिराज ए अक़ीदत पेश की।कार्यक्रम के प्रारंभ में उपज के पदाधिकारी सुभाष चन्द्र गुप्ता व जावेद अहमद सिद्दीकी अन्ना और आए हुए मेहमानों का माल्यार्पण कर स्वागत किया गया।