(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
26 जून, दोपहर 2:00 बजे। नीलकंठ होटल, हरिद्वार में दोपहर का भोजन करने के बाद लगभग एक घंटे का विश्राम सभी के लिए आवश्यक था। सुबह से यात्रा की थकान शरीर पर दिखाई दे रही थी, लेकिन मन पूरी तरह उत्साह से भरा था। विश्राम समाप्त होते ही सभी साथी अपने-अपने कमरों से बाहर निकलने लगे। कोई कैमरा संभाल रहा था, कोई प्रसाद रखने के लिए थैला तैयार कर रहा था तो कोई परिवार के सदस्यों को एकत्र कर रहा था। अब हमारी अगली मंजिल थी—मां चंडी देवी और मां मनसा देवी का पावन दर्शन।
इसी बीच एक सुखद संयोग सामने आया। सूचना मिली कि गोंडा निवासी एवं हरिद्वार के प्रतिष्ठित उद्योगपति श्री विकास तिवारी जी यह जानकर होटल पहुंचे हैं कि उनके पूज्य गुरु, तिवारी मंदिर के महंत श्रद्धेय महंत गिरीशपति त्रिपाठी जी अपने परिवार एवं साथियों के साथ हरिद्वार दर्शन के लिए पधारे हैं। होटल पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले चरण स्पर्श कर गुरुजी आशीर्वाद लिया। गुरु-शिष्य का यह आत्मीय मिलन सभी के लिए भावुक क्षण था।
कुछ देर चर्चा के बाद विकास जी ने पूरी यात्रा को व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली। स्थानीय होने के कारण उन्हें हरिद्वार के मार्ग, भीड़ और समय की पूरी जानकारी थी। उन्होंने सुझाव दिया कि पहले मां चंडी देवी के दर्शन किए जाएं। उनका तर्क था कि मां मनसा देवी मंदिर गंगा तट के अधिक निकट है, इसलिए वहां से सायंकालीन गंगा आरती के समय हर की पैड़ी पहुंचना अधिक सुविधाजनक रहेगा। उनकी बात सभी को व्यावहारिक लगी और माननीय महापौर श्री गिरीशपति त्रिपाठी जी ने तुरंत वाहनों को चंडी देवी की ओर प्रस्थान करने का संकेत दे दिया। इसी बीच गायत्री परिवार के समर्पित कार्यकर्ता डॉ. संजीव चतुर्वेदी जी पधारे। उन्होंने पहले शांतिकुंज चलने का प्रस्ताव रखा, जिसे महापौर ने स्वीकार कर लिया।
अब हमने हरिद्वार की उस पुण्यभूमि की ओर रुख किया, जहाँ आध्यात्मिक चेतना का विश्वविख्यात केंद्र युगतीर्थ शांतिकुंज स्थित है। हम सब अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर लगभग 20 मिनट में शांतिकुंज पंहुच गये। रास्ते भर अपनी सहज विनोदी शैली से सभी यात्रियों का मनोरंजन करने वाले राममोहन पाण्डेय शांतिकुंज की महिमा बताते रहे। उनकी बातों ने मन में ऐसी उत्सुकता जगा दी कि जैसे-जैसे हमारा वाहन शांतिकुंज के निकट पहुँचता गया, भीतर श्रद्धा और जिज्ञासा का भाव स्वतः गहराता चला गया।
चतुर्वेदी ने बताया कि हरिद्वार नगर के सप्तऋषि क्षेत्र में माँ गंगा के पावन तट और हिमालय की तराई की मनोरम छाया में स्थित शांतिकुंज केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि विचार, साधना, सेवा और संस्कार का जीवंत केंद्र है। लगभग 40 एकड़ में विकसित यह विशाल परिसर अखिल विश्व गायत्री परिवार का वैश्विक मुख्यालय है। इसकी स्थापना वर्ष 1971 में युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने मानव में देवत्व के जागरण और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के महान संकल्प के साथ की थी। आज विश्व के अनेक देशों से लाखों श्रद्धालु, साधक, शोधार्थी और पर्यटक यहाँ आध्यात्मिक प्रेरणा एवं जीवन-दर्शन प्राप्त करने आते हैं।
यहाँ मुख्य प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही अनुशासन, स्वच्छता, हरियाली और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा संगम दिखाई दिया, जिसने मन को तत्काल शांति से भर दिया। विशाल वृक्षों से आच्छादित परिसर, सुव्यवस्थित मार्ग, साधना में लीन श्रद्धालु और सेवा में तत्पर स्वयंसेवक यह अनुभव करा रहे थे कि यहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित है। उन्होंने बताया कि शांतिकुंज में दर्शन की परंपरा अत्यंत सरल, अनुशासित और आध्यात्मिक है। श्रद्धालु सर्वप्रथम गायत्री माता मंदिर में माँ के दर्शन करते हैं। इसके बाद पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा की समाधि पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि देते हैं। फिर प्रखर प्रज्ञा, सजल श्रद्धा तथा अखंड ज्योति के दर्शन कर कुछ समय ध्यान एवं आत्मचिंतन में व्यतीत करते हैं। हम लोगों ने भी इसी परंपरा का पालन किया।
गुरुदेव श्रीरामशर्मा एवं वंदनीया माताजी भगवती देवीकी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते समय मन अनायास ही भाव-विभोर हो उठा। समाधि के समीप खड़े होकर ऐसा लगा मानो तप, त्याग, सेवा और राष्ट्रभक्ति की दिव्य चेतना आज भी प्रत्येक आगंतुक को प्रेरित कर रही हो। उस क्षण मन में सेवा, साधना और संस्कारों के प्रति समर्पण का भाव स्वतः जागृत हो गया। इसके पश्चात हम सब को गायत्री माता मंदिर, प्रखर प्रज्ञा, सजल श्रद्धा तथा लगभग एक शताब्दी से निरंतर प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अखंड ज्योति केवल एक दीप नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ऋषि परंपरा, ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का अमर प्रतीक है। उसके सम्मुख कुछ क्षण मौन बैठते ही ऐसा अनुभव हुआ मानो भीतर की सारी अशांति शांत हो गई हो और मन नई ऊर्जा तथा सकारात्मक विचारों से भर उठा।
राष्ट्र निर्माण का जीवंत संदेश
इस अवसर पर अयोध्या के महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजलक्ष्मी त्रिपाठी, सुपुत्र अभिज्ञानपति त्रिपाठी, सुपुत्री गुनगुन तथा हमारे सभी साथियों ने शांतिकुंज के व्यवस्थापक श्री योगेन्द्र गिरी जी का सानिध्य प्राप्त किया। उन्होंने बताया कि गायत्री परिवार केवल पूजा-पाठ तक सीमित संस्था नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, व्यसनमुक्ति, नारी सशक्तीकरण, युवा जागरण, नैतिक पुनर्जागरण और सामाजिक समरसता जैसे अनेक क्षेत्रों में निरंतर कार्य कर रहा है। युग निर्माण योजना का उद्देश्य श्रेष्ठ व्यक्तित्व, सुसंस्कृत परिवार और आदर्श समाज का निर्माण करना है। उनके विचारों में भारतीय संस्कृति की आत्मा और आधुनिक समाज की आवश्यकताओं का अद्भुत समन्वय दिखाई दिया। इस आत्मीय भेंट के दौरान सभी ने राष्ट्र की उन्नति, समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण पर सार्थक चर्चा की। यह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि राष्ट्र निर्माण के संकल्प को और अधिक दृढ़ करने वाला प्रेरणादायी संवाद था।
सेवा, संस्कार और प्रेरणा की भूमि
शांतिकुंज का सबसे बड़ा आकर्षण उसका अनुशासन, सेवा-भाव और आत्मीय वातावरण है। यहाँ कोई भी व्यक्ति अतिथि नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य बन जाता है। स्वयंसेवकों का विनम्र व्यवहार, परिसर की स्वच्छता, समय का पालन और निस्वार्थ सेवा-भाव प्रत्येक आगंतुक को गहराई से प्रभावित करता है। यहाँ आने वाला व्यक्ति केवल दर्शन करके नहीं लौटता, बल्कि अपने भीतर कुछ बदलने का संकल्प लेकर लौटता है।
परिसर में अंकित प्रेरक वाक्य बार-बार मन को झकझोर रहे थे—”हम बदलेंगे, युग बदलेगा।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि जीवन का मंत्र है। “विचार क्रांति ही युग परिवर्तन का आधार है।” यह संदेश बताता है कि समाज का परिवर्तन शस्त्रों से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ विचारों से होता है। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।” यह आत्मविश्वास और कर्मयोग का संदेश देता है। वहीं “सादा जीवन, उच्च विचार” भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का स्मरण कराता है, जिसने विश्व को मानवता, संयम और सेवा का मार्ग दिखाया।
शांतिकुंज का प्रत्येक कोना मानो एक ही संदेश देता है—”हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा; हम बदलेंगे, युग बदलेगा।” यहाँ साधना केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और समस्त मानवता के कल्याण के लिए की जाती है। सेवा यहाँ पूजा है, संस्कार यहाँ शक्ति हैं और राष्ट्रभक्ति जीवन का सर्वोच्च धर्म है।
प्रेरणा लेकर आगे की यात्रा
शांतिकुंज से विदा लेते समय मन बार-बार पीछे मुड़कर उस पावन धरा को निहार रहा था। ऐसा लग रहा था मानो यह स्थान मौन रहकर भी बहुत कुछ कह रहा हो। यहाँ केवल मूर्तियों के दर्शन नहीं होते, बल्कि विचारों का परिष्कार होता है। यहाँ केवल दीपक नहीं जलते, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में सेवा, संस्कार और राष्ट्र समर्पण का प्रकाश प्रज्ज्वलित होता है। जब हमारा दल पुनः अपने वाहन की ओर लौटा तो ऐसा लगा कि हम केवल एक आश्रम से नहीं, बल्कि एक जीवंत विचार-क्रांति के केंद्र से लौट रहे हैं।
मन में नई ऊर्जा, हृदय में असीम श्रद्धा और जीवन को अधिक सार्थक बनाने का संकल्प लेकर हम माँ मनसा देवी और माँ चंडी देवी के दर्शन के लिए आगे बढ़ गए। जब हम शांतिकुंज से बाहर निकले तो मन पहले से कहीं अधिक शांत, सकारात्मक और ऊर्जावान था। ऐसा लगा कि इस यात्रा ने केवल हमारे कदमों को ही नहीं, बल्कि हमारे विचारों को भी एक नई दिशा प्रदान की है। शांतिकुंज में बिताए वे कुछ घंटे पूरी यात्रा की सबसे प्रेरणादायक स्मृतियों में सदा के लिए अंकित हो गए। वास्तव में यह वह स्थान है, जहाँ श्रद्धा साधना बनती है, साधना सेवा बनती है और सेवा राष्ट्र निर्माण का आधार बन जाती है। शांतिकुंज की यह आध्यात्मिक अनुभूति हमारी पूरी यात्रा की अमूल्य धरोहर बन गई, जो जीवन भर हमें सेवा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहेगी।