Monday, July 6, 2026
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संकल्प से सफ़र तक भाग -चार : ” गंगा स्नान से तन भी पवित्र, मन भी पवित्र “


✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


देवभूमि की पावन धरती पर शुक्रवार की सुबह एक नई ऊर्जा और नए उत्साह के साथ हमारा स्वागत कर रही थी। पिछली शाम की लंबी यात्रा की थकान शरीर पर तारी अवश्य थी, लेकिन मन में माँ गंगा के पावन दर्शन और स्नान का उत्साह कहीं अधिक था।

उत्तराखंड में लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा के पश्चात जब हम लगभग सात बजे नीलकंठ होटल पहुँचे, तब सभी साथियों के चेहरों पर थकावट स्पष्ट दिखाई दे रही थी। कोई अपने कमरे में सामान व्यवस्थित कर रहा था तो कोई थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहा था। इसी बीच व्हाट्सएप समूह पर इन्द्रजीत शुक्ल का संदेश आया “सभी साथी तैयार होकर नीचे आ जाएँ। चाय-नाश्ते के उपरांत हम सभी माँ गंगा के पावन स्नान के लिए प्रस्थान करेंगे।”

यह संदेश पढ़ते ही मानो पूरे दल में नई चेतना का संचार हो गया। कुछ ही देर में सभी साथी तैयार होकर होटल के प्रांगण में एकत्र हो गए। होटल की गर्मागर्म और स्वादिष्ट चाय ने यात्रा की सारी थकान दूर कर दी। हल्के नाश्ते के बाद तीनों वाहनों में बैठकर हम सब हरिद्वार के प्रसिद्ध सर्वानंद घाट की ओर चल पड़े।

घाट पर पहुँचते ही सामने माँ गंगा का दिव्य और अलौकिक स्वरूप देखकर मन श्रद्धा से भर उठा।

 हिमालय से उतरकर आने वाली गंगा की निर्मल, शीतल और वेगवती धारा मानो सभी को अपनी ओर बुला रही थी। जैसे ही हमने गंगा के पावन जल को स्पर्श किया, भीतर तक एक अद्भुत शांति और आत्मिक आनंद का अनुभव हुआ। ऐसा लगा मानो वर्षों की थकान, तनाव और जीवन की भागदौड़ इस पवित्र धारा में बह गई हो।

लगभग एक घंटे तक सभी साथियों ने गंगा स्नान का आनंद लिया। किसी ने श्रद्धा के साथ डुबकी लगाई, तो किसी ने गंगा की लहरों में तैराकी कर बचपन की यादें ताजा कर दीं। साथियों ने हिमालय से उतरकर आने वाली मां गंगा में स्नान के लिए सर्वानंद घाट के 10 फुट आगे लोहे की पाइप की रेलिंग पकड़ कर ठंडे पानी से शरीर की सेकाई भी की। इस दौरान गंगा के वेग में शरीर संतुलित करने के लिए रेलिंग बड़ा सहारा थी। का प्रयोग को भी सम्मिलित करने का प्रयास करें। ठंडे और निर्मल जल में अठखेलियाँ करते हुए सभी के चेहरे पर जो सहज मुस्कान थी, वही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

सच ही कहा गया है कि गंगा केवल शरीर को ही नहीं, मन और आत्मा को भी निर्मल कर देती हैं। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम सब केवल एक यात्रा दल नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक परिवार बन चुके हैं।


इसी पावन अवसर पर हमारे साथी श्री बृजमोहन तिवारी जी का यज्ञोपवीत संस्कार भी वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सम्पन्न हुआ। तीन कलश तिवारी मंदिर के महंत एवं अयोध्या के महापौर श्री गिरीश पति त्रिपाठी जी के नेतृत्व में यह धार्मिक अनुष्ठान पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ सम्पन्न कराया गया। वैदिक मंत्रों की गूंज, गंगा तट का पवित्र वातावरण और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस संस्कार को और भी दिव्य बना दिया। इस आयोजन को सफल बनाने में रवि तिवारी, दीपक शुक्ला, अनुजेंद्र तिवारी, आलोक द्विवेदी सहित अनेक साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।



गंगा स्नान के पश्चात हम सभी पुनः नीलकंठ होटल लौट आए। अब तक भूख भी अच्छी तरह लग चुकी थी। होटल में हमारे लिए जो भोजन तैयार था, वह केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि आत्मीयता से परिपूर्ण भी था। भोजन तैयार करने में साथी प्रमोद, अवधेश, अंकित तिवारी आदि की महती भूमिका रही। इस अवसर पर अन्नपूर्णा स्वरूपा  श्रीमती राजलक्ष्मी त्रिपाठी जी का विशेष उल्लेख करना आवश्यक है। उनके स्नेह, अपनत्व और मातृत्व से परोसा गया भोजन किसी साधारण भोजन की तरह नहीं, बल्कि प्रसाद के समान प्रतीत हो रहा था। प्रत्येक व्यंजन में घर जैसा स्वाद, शुद्धता और आत्मीयता का ऐसा अद्भुत संगम था कि सभी साथी उनकी पाक-कला और स्नेहभाव की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे। यात्रा के दौरान ऐसा स्वादिष्ट और प्रेम से परोसा गया भोजन पूरे दल के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन गया।

हमारे दल में लगभग चालीस से अधिक साथी थे, लेकिन पूरे समय अनुशासन, आत्मीयता और पारिवारिक वातावरण बना रहा। भोजन के बाद कुछ समय विश्राम हुआ, वहीं दूसरी ओर दीपक शुक्ला, बृजमोहन तिवारी और चंद्रशेखर तिवारी के नेतृत्व में हारमोनियम, ढोलक और मंजीरे की मधुर ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। भजन, लोकगीत और सामूहिक गायन ने यात्रा की थकान को पूरी तरह समाप्त कर दिया। ऐसा लग रहा था मानो संगीत स्वयं इस यात्रा का एक अभिन्न अध्याय बन गया हो।

लगभग एक घंटे के विश्राम और संगीत के आनंद के बाद सभी साथी पुनः तैयार होने लगे। अब उत्सुकता थी हरिद्वार की दो प्रमुख शक्तिपीठों माँ चंडी देवी और माँ मनसा देवी के आत्मिक दर्शन की। साथ ही संध्या बेला में हर की पैड़ी पर होने वाली विश्वविख्यात गंगा आरती का दिव्य दर्शन हमारा इंतजार कर रहा था। श्रद्धा, उत्साह और नई ऊर्जा के साथ हमारा पूरा दल अगले आध्यात्मिक पड़ाव की ओर बढ़ चला।

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