Sunday, July 5, 2026
HomeAyodhya/Ambedkar Nagarअयोध्यासंकल्प से सफर तक – भाग : तीन - देवभूमि की गोद...

संकल्प से सफर तक – भाग : तीन – देवभूमि की गोद में : नहरों, नदियों और जंगलों का आध्यात्मिक संगम


✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


हमने नगीना को पार किया और अपने राज्य उत्तर प्रदेश की ओर मुड़कर अयोध्या धाम को प्रणाम किया। इसके बाद हम सब देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में प्रवेश कर गए। जैसे ही हरिद्वार जिले की सीमा प्रारंभ हुई, भीतर एक अलग ही कौतूहल जागृत होने लगा। ऐसा लग रहा था मानो हम प्रकृति, अध्यात्म और हिमालय की पावन गोद में प्रवेश कर रहे हों।

अब तक शिवालिक पर्वतमाला की तराई स्पष्ट दिखाई देने लगी थी और सड़कें धीरे-धीरे पहाड़ों की ओर ऊंची होने लगी थीं। हवा में हल्की ठंडक घुली थी। यात्रा का रोमांच अब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। कुछ किलोमीटर आगे बढ़ते ही जंगलों का प्रथम दृश्य सामने आ गया। दोनों ओर दूर-दूर तक फैले साल के वृक्ष मानो देवभूमि के द्वारपाल बनकर खड़े हों। उनकी छाया से छनकर आती धूप सड़क पर सुंदर आकृतियाँ बना रही थी। वाहन की खिड़कियाँ खुल चुकी थीं और शीतल हवा के झोंके पूरे वातावरण को आनंदमय बना रहे थे।

हमारे साथ यात्रा कर रहे राहुल सिंह, सुनील अवस्थी, अभय यादव और निरंकार पाठक भी इस बदलते प्राकृतिक परिवेश को बड़ी उत्सुकता से निहार रहे थे। कभी कोई दूर दिखाई देती पर्वत-श्रृंखला की ओर संकेत करता, तो कभी कोई जंगल की गहराई में छिपे किसी पक्षी की आवाज़ सुनकर उधर की ओर देखने लगता।

अब तक उत्तराखंड के गठन को लेकर चर्चा छिड़ चुकी थी। इस चर्चा में साथी विनोद पाठक, आदित्य सिंह, श्रीनिवास शास्त्री भी शामिल हो गए और आंदोलन के दौरान घटित तमाम घटनाएं विमर्श का विषय बन गईं। आपसी बातचीत में यह तथ्य एक बार फिर सामने आ गया कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुविधाओं की मांग से प्रेरित था। 1994 के आंदोलन ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया था। खटीमा और मुज़फ्फरनगर की घटनाओं ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। अंततः 09 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड भारत का 27वाँ राज्य बना। उत्तराखंड के गठन के पीछे छिपी मूल भावना के साथ ही वहां की तरक्की को लेकर चर्चा चल ही रही थी कि हम सबके बीच प्रकृति, वन्यजीवन और उत्तराखंड की आध्यात्मिक परंपरा का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। महापौर जी और अन्य साथी भी इस परिचर्चा का आनंद ले रहे थे। यात्रा का प्रत्येक पड़ाव हमें एक नया विषय और नया अनुभव दे रहा था।


 


हरिद्वार क्षेत्र में प्रवेश करते ही सबसे पहले जिस संरचना ने हमारा ध्यान आकर्षित किया, वह थी ऊपरी गंगा नहर। गंगा से निकली यह विशाल नहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा कही जाती है। इसके तेज बहते जल को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यही धारा लाखों किसानों के खेतों के पेड़-पौधों की जीवनरेखा है। यह केवल एक नहर नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि की आधारशिला है।

आगे बढ़ने पर मार्ग में अनेक छोटी-छोटी जलधाराएँ दिखाई दीं। गर्मी का मौसम होने के कारण अधिकांश धाराओं में जल कम था, फिर भी उनके विस्तृत पाट, सफेद पत्थर, मोरंग और चमकती रेत इस बात का संकेत दे रहे थे कि वर्षा ऋतु में यही धाराएँ प्रचंड वेग से बहती होंगी। इन्हीं में रानीपुर राव प्रमुख है, जो राजाजी पार्क के जंगलों से वर्षाजल को आगे बढ़ाती है। प्रकृति का यह शांत रूप मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था।

अब हम ऋषिकेश मार्ग पर स्थित राजाजी टाइगर रिजर्व के विशाल वन क्षेत्र में प्रवेश कर चुके थे। सड़क के दोनों ओर फैला अथाह जंगल किसी हरे महासागर जैसा प्रतीत हो रहा था। ऊँचे-ऊँचे साल, शीशम, खैर और अन्य मिश्रित पर्णपाती वृक्षों ने पूरे क्षेत्र को हरियाली से ढक रखा था। जंगल के भीतर से आती पक्षियों की मधुर आवाज़ें वातावरण को और भी जीवंत बना रही थीं। यद्यपि हमारी यात्रा के दौरान कोई वन्यजीव प्रत्यक्ष दिखाई नहीं दिया, फिर भी अनेक स्थानों पर हाथियों के आवागमन की चेतावनी देने वाले बोर्ड यह बताते रहे कि हम उनके प्राकृतिक वास के बीच से होकर गुजर रहे हैं। इसलिए वाहन की गति धीमी कर दी गई थी। जंगल की निस्तब्धता में एक अलग ही आकर्षण था। ऐसा लगता था कि वृक्षों की ओट में कहीं हाथियों का झुंड, कहीं चीतलों का समूह और कहीं कोई तेंदुआ मस्ती में या भोजन की तलाश में विचरण कर रहा है।


 


यात्रा के दौरान राहुल सिंह ने बताया कि राजाजी के जंगलों में हाथियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यहाँ का हाथी कॉरिडोर पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस पर सुनील अवस्थी ने वन संरक्षण के तौर-तरीके पर चर्चा छेड़ दी, जबकि निरंकार पाठक ने कहा कि यदि प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में देखना हो तो राजाजी जैसा जंगल बहुत कम स्थानों पर मिलेगा। उनकी बातें सुनते-सुनते यह यात्रा केवल दर्शनीय स्थलों की नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने की यात्रा बन गई।

राजाजी के जंगलों को पार करते हुए हमें सोंग नदी का विस्तृत पाट दिखाई दिया। शिवालिक पर्वतमाला से निकलने वाली यह नदी आगे चलकर गंगा में समाहित हो जाती है। वर्षा ऋतु में इसका स्वरूप अत्यंत उग्र हो जाता है, जबकि गर्मियों में इसके विस्तृत रेतीले तट और पत्थरों से भरा पाट सूर्य की किरणों की अठखेलियों के साथ प्रकृति की अलग ही छटा प्रस्तुत करते हैं। यह नदी जंगल के वन्यजीवों के लिए जीवनरेखा है और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

नीलकंठ होटल की ओर बढ़ते हुए सड़क अब लगातार घुमावदार होती जा रही थी। अब ऐसा अनुभव हो रहा था कि मां गंगा के  धाम तक पहुँचने से पहले प्रकृति स्वयं अपने विराट स्वरूप का दर्शन करा रही है। गंगा घाटी की गूँज, जंगल की निस्तब्धता और पर्वतों की गंभीरता मिलकर वातावरण को आध्यात्मिक बना रही थी। यहाँ पहुँचकर सहज ही अनुभव होता है कि प्रकृति और अध्यात्म वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं।

हरिद्वार की सीमा से लेकर शहर तक का यह सम्पूर्ण मार्ग वास्तव में प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। गंगा की पावन धारा, ऊपरी गंगा नहर की जीवनदायिनी व्यवस्था, रानीपुर राव और सोंग जैसी नदियाँ, राजाजी टाइगर रिजर्व की जैव-विविधता तथा शिवालिक पर्वतमाला की हरित छटा इस यात्रा को केवल एक मार्ग नहीं रहने देती, बल्कि हरिद्वार के देवभूमि होने का स्पष्ट एहसास कर देती है। अब तक हरिद्वार तक की यात्रा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि प्रकृति से साक्षात्कार का माध्यम बन चुकी थी। यात्रा मैदानी और पहाड़ी इलाकों के बीच के अंतर के अध्ययन का भी अवसर बन रही थी। कई युवा साथी अपनी जिज्ञासा को खुलकर व्यक्त कर रहे थे। कुछ साथी तो गूगल के माध्यम से हरिद्वार से जुड़ी तमाम जानकारियां संकलित कर एक दूसरे को अवगत करा रहे थे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

RELATED ARTICLES

Most Popular

Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar
Ayodhya Samachar

Recent Comments