✍️ मुकेश पांडेय की कलम से
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )
हमने नगीना को पार किया और अपने राज्य उत्तर प्रदेश की ओर मुड़कर अयोध्या धाम को प्रणाम किया। इसके बाद हम सब देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में प्रवेश कर गए। जैसे ही हरिद्वार जिले की सीमा प्रारंभ हुई, भीतर एक अलग ही कौतूहल जागृत होने लगा। ऐसा लग रहा था मानो हम प्रकृति, अध्यात्म और हिमालय की पावन गोद में प्रवेश कर रहे हों।
अब तक शिवालिक पर्वतमाला की तराई स्पष्ट दिखाई देने लगी थी और सड़कें धीरे-धीरे पहाड़ों की ओर ऊंची होने लगी थीं। हवा में हल्की ठंडक घुली थी। यात्रा का रोमांच अब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। कुछ किलोमीटर आगे बढ़ते ही जंगलों का प्रथम दृश्य सामने आ गया। दोनों ओर दूर-दूर तक फैले साल के वृक्ष मानो देवभूमि के द्वारपाल बनकर खड़े हों। उनकी छाया से छनकर आती धूप सड़क पर सुंदर आकृतियाँ बना रही थी। वाहन की खिड़कियाँ खुल चुकी थीं और शीतल हवा के झोंके पूरे वातावरण को आनंदमय बना रहे थे।
हमारे साथ यात्रा कर रहे राहुल सिंह, सुनील अवस्थी, अभय यादव और निरंकार पाठक भी इस बदलते प्राकृतिक परिवेश को बड़ी उत्सुकता से निहार रहे थे। कभी कोई दूर दिखाई देती पर्वत-श्रृंखला की ओर संकेत करता, तो कभी कोई जंगल की गहराई में छिपे किसी पक्षी की आवाज़ सुनकर उधर की ओर देखने लगता।
अब तक उत्तराखंड के गठन को लेकर चर्चा छिड़ चुकी थी। इस चर्चा में साथी विनोद पाठक, आदित्य सिंह, श्रीनिवास शास्त्री भी शामिल हो गए और आंदोलन के दौरान घटित तमाम घटनाएं विमर्श का विषय बन गईं। आपसी बातचीत में यह तथ्य एक बार फिर सामने आ गया कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुविधाओं की मांग से प्रेरित था। 1994 के आंदोलन ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया था। खटीमा और मुज़फ्फरनगर की घटनाओं ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। अंततः 09 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड भारत का 27वाँ राज्य बना। उत्तराखंड के गठन के पीछे छिपी मूल भावना के साथ ही वहां की तरक्की को लेकर चर्चा चल ही रही थी कि हम सबके बीच प्रकृति, वन्यजीवन और उत्तराखंड की आध्यात्मिक परंपरा का मुद्दा उठ खड़ा हुआ। महापौर जी और अन्य साथी भी इस परिचर्चा का आनंद ले रहे थे। यात्रा का प्रत्येक पड़ाव हमें एक नया विषय और नया अनुभव दे रहा था।

हरिद्वार क्षेत्र में प्रवेश करते ही सबसे पहले जिस संरचना ने हमारा ध्यान आकर्षित किया, वह थी ऊपरी गंगा नहर। गंगा से निकली यह विशाल नहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा कही जाती है। इसके तेज बहते जल को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यही धारा लाखों किसानों के खेतों के पेड़-पौधों की जीवनरेखा है। यह केवल एक नहर नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि की आधारशिला है।
आगे बढ़ने पर मार्ग में अनेक छोटी-छोटी जलधाराएँ दिखाई दीं। गर्मी का मौसम होने के कारण अधिकांश धाराओं में जल कम था, फिर भी उनके विस्तृत पाट, सफेद पत्थर, मोरंग और चमकती रेत इस बात का संकेत दे रहे थे कि वर्षा ऋतु में यही धाराएँ प्रचंड वेग से बहती होंगी। इन्हीं में रानीपुर राव प्रमुख है, जो राजाजी पार्क के जंगलों से वर्षाजल को आगे बढ़ाती है। प्रकृति का यह शांत रूप मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था।
अब हम ऋषिकेश मार्ग पर स्थित राजाजी टाइगर रिजर्व के विशाल वन क्षेत्र में प्रवेश कर चुके थे। सड़क के दोनों ओर फैला अथाह जंगल किसी हरे महासागर जैसा प्रतीत हो रहा था। ऊँचे-ऊँचे साल, शीशम, खैर और अन्य मिश्रित पर्णपाती वृक्षों ने पूरे क्षेत्र को हरियाली से ढक रखा था। जंगल के भीतर से आती पक्षियों की मधुर आवाज़ें वातावरण को और भी जीवंत बना रही थीं। यद्यपि हमारी यात्रा के दौरान कोई वन्यजीव प्रत्यक्ष दिखाई नहीं दिया, फिर भी अनेक स्थानों पर हाथियों के आवागमन की चेतावनी देने वाले बोर्ड यह बताते रहे कि हम उनके प्राकृतिक वास के बीच से होकर गुजर रहे हैं। इसलिए वाहन की गति धीमी कर दी गई थी। जंगल की निस्तब्धता में एक अलग ही आकर्षण था। ऐसा लगता था कि वृक्षों की ओट में कहीं हाथियों का झुंड, कहीं चीतलों का समूह और कहीं कोई तेंदुआ मस्ती में या भोजन की तलाश में विचरण कर रहा है।