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किसान उत्पादक संगठन में तीन लाख की निकासी पर बवाल, फर्जी हस्ताक्षर से रुपए निकाले जाने का आरोप

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जलालपुर अंबेडकर नगर। सहकारी विभाग की निगरानी में संचालित किसान उत्पादक संगठन में सरकारी अनुदान की धनराशि के उपयोग को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। तहसील क्षेत्र के बड़ेपुर स्थित किसान उत्पादक संगठन सहकारी समिति लिमिटेड में करीब तीन लाख रुपये की निकासी को लेकर पदाधिकारियों और सदस्यों ने फर्जी हस्ताक्षर कर धन निकालने का आरोप लगाया है। मामले ने सहकारी विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

समिति अध्यक्ष फूलचंद वर्मा ने बताया कि संगठन का पंजीकरण 18 सितंबर 2024 को हुआ था। एनसीडीसी/एफपीओ योजना के तहत समिति को 6.24 लाख रुपये का अनुदान मिला था। आरोप है कि समिति के सचिव सचिन सतिराम यादव ने लगभग तीन लाख रुपये की निकासी कर ली, जबकि अधिकांश पदाधिकारियों और सदस्यों को इसकी जानकारी तक नहीं दी गई।

कार्यकारिणी सदस्य अच्छे लाल मौर्य, सुनील मौर्य और शिवम सिंह का कहना है कि निकासी से संबंधित दस्तावेजों में उनके हस्ताक्षर दिखाए गए हैं, जबकि उन्होंने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए। वहीं समिति अध्यक्ष फूलचंद वर्मा ने भी दस्तावेजों पर अंकित हस्ताक्षरों को अपना मानने से इन्कार करते हुए निकासी की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मामले को लेकर बुलाई गई समिति की बैठक में सचिव को स्पष्टीकरण देने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन वह बैठक में नहीं पहुंचे। इससे सदस्यों की शंकाएं और बढ़ गई हैं। हालांकि सचिव ने जल्द ही बैठक में उपस्थित होकर पूरे मामले की जानकारी देने की बात कही है।

ग्रामीणों का कहना है कि किसान उत्पादक संगठनों को किसानों की आय बढ़ाने और कृषि गतिविधियों को मजबूत करने के उद्देश्य से सरकारी सहायता दी जाती है। यदि अनुदान राशि के उपयोग में अनियमितता और फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया है तो यह किसानों के हितों के साथ बड़ा खिलवाड़ है।

उधर सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता राघवेंद्र प्रताप शुक्ला ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में है। पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी और जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

समिति के सदस्यों ने निकासी से जुड़े बैंक अभिलेखों, प्रस्ताव पुस्तिका, उपस्थिति पंजिका और हस्ताक्षर रजिस्टर की फोरेंसिक जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच से ही सरकारी धन के उपयोग की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला सहकारी विभाग में निगरानी तंत्र की खामियों और संभावित भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण बन सकता है।

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