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यात्रा वृतांत- भाग पांच : मां पूर्णागिरि की कठिन चढ़ाई: रोमांच और विश्वास की अविस्मरणीय यात्रा

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✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


लगभग 5,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित अन्नपूर्णा पर्वत के शिखर पर विराजमान मां पूर्णागिरि के दर्शन का उत्साह मन में था, लेकिन जैसे ही हमने पैदल यात्रा शुरू की, यह स्पष्ट हो गया कि यह मार्ग बिल्कुल आसान नहीं है। शुरुआत में लगा कि कुछ दूर चलने के बाद रास्ता समतल हो जाएगा और आगे की यात्रा सहज हो जाएगी, किंतु यह भ्रम शीघ्र ही टूट गया। सामने दूर तक केवल सीढ़ियां ही सीढ़ियां दिखाई दे रही थीं और हर अगला कदम पिछले कदम से अधिक कठिन प्रतीत हो रहा था।



सच कहूं तो पहाड़ों पर चढ़ने का अनुभव मेरे लिए बिल्कुल नया था। श्रावस्ती जिले में दैनिक जागरण में ब्यूरो चीफ रहते हुए शिवालिक पर्वतमाला के निचले हिस्सों का सीमित परिचय अवश्य मिला था, लेकिन हिमालय की मध्य श्रेणी में स्थित ऐसे दुर्गम धार्मिक स्थल तक पैदल पहुंचना मेरे लिए पहली बड़ी परीक्षा थी। अब तक अन्नपूर्णा और हिमालय की ऊंची चोटियों के बारे में केवल पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और समाचारों में पढ़ा था, प्रत्यक्ष रूप से उनका सामना करने का अवसर पहली बार मिला था।


हर सीढ़ी बन गई परीक्षा


व्यक्तिगत रूप से मैं कभी भी सीढ़ियां चढ़ने में बहुत सहज नहीं रहा। सामान्यतः चार-पांच मंजिला इमारत की सीढ़ियां भी अकसर थका देती हैं। ऐसे में हजार सीढ़ियों वाली इस कठिन चढ़ाई की कल्पना ही चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन मां पूर्णागिरि के दर्शन की तीव्र इच्छा ने कदमों को रुकने नहीं दिया। जैसे-जैसे हम ऊपर बढ़ते गए, सांसें तेज होती गईं और कई स्थानों पर रुककर विश्राम भी करना पड़ा। पानी-पीकर और कुछ देर बैठकर फिर आगे बढ़ते रहे।


ढाई से तीन घंटे का संघर्ष


लगातार रुक-रुककर चलने, सांस संभालने और फिर चढ़ाई जारी रखने के क्रम में लगभग ढाई से तीन घंटे बीत गए। आखिरकार वह क्षण आया, जब हम अन्नपूर्णा पर्वत की ऊंचाई पर स्थित मां पूर्णागिरि धाम पहुंच गए। दूर से दिखाई देता मंदिर अब हमारी आंखों के सामने था। सारी थकान मानो पल भर में समाप्त हो गई और मन केवल श्रद्धा और कृतज्ञता से भर उठा।


मां के दिव्य दर्शन का सौभाग्य


 


मंदिर में पहुंचकर हमने प्रसाद अर्पित किया और मां के चरणों में शीश नवाया। श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ होने के कारण पुजारीजी सभी को शीघ्र दर्शन कर आगे बढ़ने का अनुरोध कर रहे थे। प्रारंभ में उन्होंने हमसे भी जल्दी करने को कहा, लेकिन बातचीत के दौरान जब दीपक जी ने उन्हें बताया कि हम अयोध्या से आए हैं और तीन कलश तिवारी मंदिर की श्रद्धावनत परंपरा से जुड़े हैं और महंत गिरीशपति त्रिपाठी के निकट सहयोगी हैं। दीपक ने हमारा भी परिचय कर पुजारी से कराया तो उनका व्यवहार और अधिक आत्मीय हो गया।

पुजारी जी ने विशेष कृपा करते हुए मंदिर की एक खिड़की खोली और उस स्थान की ओर संकेत किया, जिसे स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वह पावन स्थल माना जाता है, जहां माता की नाभि भाग गिरने की कथा प्रचलित है। इस स्थान का दर्शन हमारे लिए अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक अनुभव देने था। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा कि अगली बार भीड़-भाड़ के बजाय सामान्य दिनों में आएं, ताकि अधिक समय लेकर शांत वातावरण में मां की पूजा-अर्चना और विस्तृत दर्शन का अवसर मिल सके। हमने उन्हें भी अयोध्या आने का निमंत्रण दिया, जिसे उन्होंने सहज स्वीकार किया।


उतराई भी कम कठिन नहीं


दर्शन के बाद हमने वापसी की यात्रा शुरू की। अक्सर लोग समझते हैं कि उतरना आसान होता है। यही बात मैं भी समझ रहा था, लेकिन पहाड़ की तीखी ढलान के बीच लगातार सीढ़ियों पर नीचे उतरना भी कम कठिन नहीं था। घुटनों, पंजों और फिल्ली पर लगातार दबाव पड़ रहा था। सावधानी से चलते हुए हमें नीचे पहुंचने में एक घंटे से अधिक समय लग गया। थकान अवश्य थी, लेकिन मन में मां पूर्णागिरि के दर्शन का संतोष उससे कहीं अधिक था।


मां की कृपा से सकुशल यात्रा


पूरी यात्रा के दौरान कई बार ऐसा लगा कि शरीर जवाब दे देगा, लेकिन हर बार मन में यही विश्वास बना रहा कि मां पूर्णागिरि की कृपा साथ है। शायद यही आस्था थी कि जिसने मेरे जैसे न के बराबर पर्वतारोहण अनुभव रखने वाले व्यक्ति को इस कठिन चढ़ाई को पूरा करने और सकुशल वापस लौटने का आत्मविश्वास दिया। यह यात्रा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक दृढ़ता की भी परीक्षा थी।

पर्वत से नीचे उतरने के बाद सबसे पहले हमने पार्किंग में अपना वाहन खोजा और फिर टनकपुर स्थित होटल की ओर चल पड़े।

कई घंटे की कठिन पदयात्रा के बाद भूख भी खूब लग चुकी थी। रास्ते में एक साधारण ढाबे पर रुककर शाकाहारी भोजन का स्वाद लिया। उस समय वही सादा भोजन किसी प्रसाद से कम नहीं लग रहा था। भोजन के बाद होटल पहुंचकर विश्राम किया और अगले दिन की वापसी यात्रा की तैयारी की।

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