लखनऊ । आर्यभट्ट भू-सूचना विज्ञान अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, “गैर-सरकारी संगठन“ या एनजीओ को पहली बार 1945 में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 71 में इस नाम से संबोधित किया गया था। भारतीय केंद्रीय सांख्यिकी संस्थान की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 33 लाख एनजीओ हैं, जिनमें से केवल 1,87,395 संस्थाएं सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि एनजीओ, अन्य प्रकार के संगठनों की तुलना में 10-60 प्रतिशत अधिक प्रभावी होते हैं। मेटा-विश्लेषण से पता चला कि एनजीओ द्वारा संचालित कार्यक्रमों का प्रभाव, सरकार द्वारा किए गए कार्यों की तुलना में 113 प्रतिशत अधिक होता है।
देश भर में फैली स्वयंसेवी संस्थाओं के इस विशाल नेटवर्क में कई तरह के कार्य किए जाते हैं, परंतु जीव दया और करुणा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं की संख्या बहुत कम है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता संस्था “समस्त महाजन“ ने पिछले दो दशकों में जीव दया, पशु कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2023-24 में संस्था ने 51 करोड़ रुपये का बजट खर्च किया, जो किसी भी एनजीओ द्वारा जीव दया और पर्यावरण संरक्षण पर खर्च की गई सबसे बड़ी राशि मानी जा रही है। संस्था का लक्ष्य 2024-25 में इस राशि को बढ़ाकर 60 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का है। गोबर- गोमूत्र से गांव की अर्थव्यवस्था सुधारने मैं जुटी एक स्वयंसेवी संस्था समस्त महाजन पर प्रधानमंत्री के संज्ञान में आया है क्योंकि, अभी हाल में गुजरात के पालीताणा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूछे जाने पर डॉ गिरीश ने अपने कार्यों की प्रगति बताई।
समस्त महाजन के मैनेजिंग ट्रस्टी डॉक्टर गिरीश जयंतीलाल शाह जो भारत सरकार के अधीन कार्यरत भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के सदस्य हैं, वह गांव और शहर में लावारिस पशुओं की बढ़ती हुई चुनौती को प्राकृतिक ढंग से सुलझाने की कोशिश में लगे हैं। क्योंकि केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार है जहां लावारिस पशुओं के समस्या से निपटने के लिए “सेक्स शॉर्टेड सीमेंन“ की टेक्नोलॉजी को किसानों तक पहुंच कर बछड़े के जगह बछिया पैदा करने की कवायद कर रही है, वही डॉ शाह गौशाला के निराश्रित पशुओं के गोबर -गोमूत्र के बेहतर उपयोग से गौशालाओं को स्वावलंबी बनाने के साथ-साथ जमीन को उपजाऊ बनाने और मिट्टी को जहरीली बनने से रोकने की रोकने की पहल कर रहे हैं। प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो के एक रिपोर्ट के अनुसार , पशुधन आबादी ‘गणना-2012’ की तुलना में 4.6 प्रतिशत बढ़कर 535.78 मिलियन के स्तर पर पहुंच गई है जो केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।
