अयोध्या। डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को भी अत्यधिक कार्यभार, तनाव और मानसिक दबाव के कारण बर्नआउट सिंड्रोम जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने डॉक्टर्स डे के अवसर पर आयोजित वार्ता में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और समय पर मनोपरामर्श लेने से इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि विभिन्न अध्ययनों के अनुसार एक-तिहाई से अधिक चिकित्सक और पैरामेडिकल कर्मी बर्नआउट सिंड्रोम का अनुभव करते हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) के अध्ययन के मुताबिक, अत्यधिक कार्यभार, गंभीर मरीजों का उपचार, परिजनों को बुरी खबर देना तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों से लगातार जूझना चिकित्सा कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वहीं, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परामर्श लेने में झिझक स्थिति को और गंभीर बना देती है।
डॉ. मनदर्शन ने बताया कि युवा चिकित्सक और प्रशिक्षु पैरामेडिकल स्टाफ इस समस्या के अधिक जोखिम वाले वर्ग में आते हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं में अवसाद, चिंता और मानसिक थकान की समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है, जबकि पुरुषों में तनाव से निपटने के लिए मादक पदार्थों की ओर झुकाव बढ़ सकता है, जो आगे चलकर अवसाद का कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि मानसिक तनाव का प्रभाव केवल कार्यस्थल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने, समय पर मनोपरामर्श लेने और सकारात्मक माहौल में कार्य करने की अपील की। उनके अनुसार खुशमिजाजी, सहयोग की भावना और सकारात्मक व्यवहार से तनाव कम होता है तथा मानसिक दबाव सहन करने की क्षमता बढ़ती है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में मेंटल रेजिलिएंस कहा जाता है।