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संकल्प से सफर तक भाग : 12 “यादों के साथ फिर बढ़े रामनगरी की ओर कदम”

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◆  एक अविस्मरणीय यात्रा का सुखद समापन


ऋषिकेश में गंगा की गोद में रोमांचकारी राफ्टिंग का आनंद लेने के बाद हम सभी साथी पुनः हरिद्वार स्थित नीलकंठ होटल लौट आए। वहां पहले से मौजूद साथियों से मुलाकात हुई। सभी अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे। किसी के लिए गंगा स्नान अविस्मरणीय था, तो किसी के लिए राफ्टिंग जीवन का सबसे रोमांचकारी अनुभव। होटल पहुंचने के बाद सभी ने स्नान कर थोड़ी देर विश्राम किया। इसके बाद दोपहर का भोजन किया गया और यात्रा के अंतिम चरण की तैयारियां शुरू हो गईं।



शाम लगभग चार बजे चाय पीने के बाद हम सभी अपने-अपने वाहनों पर सवार हुए और देवभूमि उत्तराखंड को प्रणाम करते हुए रामनगरी अयोध्या की ओर प्रस्थान कर दिया। वाहनों के आगे बढ़ते ही हरिद्वार, ऋषिकेश और मसूरी की मधुर स्मृतियां मन में चलचित्र की तरह घूमने लगीं। कोई मोबाइल में तस्वीरें देख रहा था, तो कोई बीते तीन दिनों के अनुभवों को शब्द दे रहा था।

लगभग चार घंटे की यात्रा के बाद रात्रि करीब आठ बजे हम लोग एक ऐसे स्थान पर पहुंचे, जहां हाल ही में निर्मित एक सुंदर पेट्रोल पंप दिखाई दिया। पंप परिसर के एक हिस्से में सीमेंट का विशाल पक्का प्लेटफॉर्म बना हुआ था, जिसकी उस समय धुलाई की जा रही थी। चारों ओर सफाई और व्यवस्थित वातावरण देखकर महापौरजी ने सुझाव दिया कि यहीं कुछ देर विश्राम करते हुए रात्रि भोजन बनाया जाए। सभी साथियों ने एक स्वर में इस प्रस्ताव का समर्थन किया।

कुछ ही देर में तीनो वाहनो एक किनारे खड़े कर दिए गए। दरी,  चादर,  कंबल और चटाइयां निकालकर साफ स्थान पर बिछा दी गईं। देखते ही देखते वह स्थान किसी अस्थायी शिविर का रूप लेने लगा। कई दिनों से साथ-साथ यात्रा कर रहे हम सभी लोग अब एक परिवार की तरह हो चुके थे। किसी तरह की औपचारिकता नहीं थी, जो जहां आवश्यक लगा, वहीं सेवा में जुट गया।



पहले से तय था कि वापसी यात्रा का अंतिम सामूहिक भोजन भी कुछ विशेष होगा। निर्णय लिया गया कि इस रात्रि के भोजन में गरमागरम पूड़ियां,  आलू की मसालेदार सब्जी,  स्वादिष्ट तहरी और रसीले आम परोसे जाएंगे। भोजन बनाने की जिम्मेदारी प्रमोद वर्मा, साधना, अवधेश, अंकित तिवारी, कुलदीप मौर्या, भास्कर राव, विष्णु यादव सहित कई साथियों ने स्वयं संभाल ली। कोई आटा गूंधने लगा,  कोई सब्जी काटने में जुट गया,  कोई चूल्हे की व्यवस्था करने लगा। कुछ ही देर में पूरे वातावरण में पकते भोजन की सुगंध फैलने लगी।

उधर, जब भोजन बनने लगा, तब बचे हुए समय का सदुपयोग करने के लिए महापौरजी ने सुझाव दिया कि क्यों न इस अंतिम पड़ाव को और भी यादगार बनाया जाए। फिर क्या था,  देखते ही देखते वहीं एक छोटी-सी संगीत संध्या सज गई। दरी पर सभी साथी गोलाकार बैठ गए। यहाँ हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा सज गया। हारमोनियमपर दीपक शुक्ल, चन्द्रशेखर तिवारी ने अपनी उगंलिया फिराई, बृज मोहन ने ढोलक पर थाप दी। मंजीरा की अवनीश ने संभाला इसके बाद वातावरण में संगीत की मधुर धुनि गूंज उठी।

सबसे पहले भक्ति का स्वर गूंजा। तीन कलश तिवारी मंदिर के महंत गिरीश पति त्रिपाठी ने राम धुनि छेड़ी। उन्होंने दो भजन भी सुनाए। साथीगण भजन पर झूम उठे। इसके बाद ज्योतिषाचार्य दीपक शुक्ला जी ने मधुर भजन “माँ सुनाओ मुझे वो कहानी, जिसमें राजा न हो न हो रानी…” प्रस्तुत किया। अब बारी थी चन्द्रशेखर तिवारी की। उन्होंने गज़ल “ लज्जते गम बढ़ा दीजिए, आप फिर मुस्कुरा दीजिए…”सुना कर साथियों का दिल जीत लिया। उनके बाद बृजमोहन तिवारी ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से वातावरण को आनन्दित कर दिया। श्रीनिवास शास्त्री एवं विनोद पाठक मृदुल ने अपनी-अपनी पसंद के भजन, गीत और चुनिंदा ग़ज़लें सुनाईं। श्रोता साथियों ने तालियां बजा कर उत्साहवर्धन किया।

धीरे-धीरे संगीत संध्या पूरी तरह रंग जमाने लगी। भक्ति, मित्रता और आत्मीयता का ऐसा संगम शायद ही किसी मंच पर देखने को मिले। यात्रा की थकान कब दूर हो गई, किसी को समय कब बीता, पता ही नहीं चला। लगभग डेढ़ घंटे तक भजन, गीत और ग़ज़लों का यह सिलसिला चलता रहा। श्रीमती राजलक्ष्मी तिवारी ने कलाकारों पर आशीर्वाद स्वरूप न्योछावर लुटाया। उस रात खुला आकाश,  शीतल हवा और साथियों का आत्मीय सान्निध्य इस आयोजन को और भी यादगार बना रहा था। ऐसा लग रहा था मानो यह कोई साधारण विश्राम स्थल नहीं, बल्कि परिवार का कोई उत्सव हो।

इधर संगीत संध्या अपने चरम पर थी और उधर भोजन भी पूरी तरह तैयार हो चुका था। महापौरजी के आग्रह पर सभी साथी पंक्तिबद्ध होकर बैठ गए। पहले तहरी परोसी गई,  फिर गरमागरम पूड़ियां और सब्जी। अंत में मीठे आमों ने भोजन का स्वाद और भी बढ़ा दिया। यात्रा के दौरान सामूहिक रूप से बैठकर किया गया यह भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं,  बल्कि अपनत्व के साथ मिलकर जीने की भारतीय परंपरा का सुंदर उदाहरण भी था।

भोजन के उपरांत सभी साथी ने जल ग्रहण किया और फिर एक-एक कर अपने-अपने वाहनों में बैठ गए। अब यात्रा का अंतिम चरण आरंभ हो चुका था। देवभूमि पीछे छूट रही थी और रामनगरी हमें अपनी ओर बुला रही थी।

रात्रि गहराने लगी थी। सड़क के दोनों ओर केवल वाहनों की रोशनियां दिखाई दे रही थीं। अब बाहर का दृश्य भले स्पष्ट न था,  लेकिन भीतर का मन बीते तीन दिनों की अनगिनत स्मृतियों से आलोकित था। कोई हर की पैड़ी की गंगा आरती को याद कर रहा था, कोई मां चंडी और मां मनसा देवी के दर्शन को, कोई मसूरी की बादलों से घिरी पहाड़ियों को तो कोई ऋषिकेश की रोमांचकारी राफ्टिंग को।

भोर के समय जब हमारा काफिला लखनऊ पहुंचा, तब सभी साथियों के चेहरे पर घर लौटने की उत्सुकता स्पष्ट दिखाई देने लगी। अब हर कोई अपने परिवार से मिलने के लिए आतुर था। बातचीत का विषय भी बदल चुका था। कोई घर पहुंचने की सूचना फोन पर दे रहा था, तो कोई अपने परिजनों को यात्रा के संस्मरण सुनाने की तैयारी कर रहा था।

आखिर वह क्षण भी आ गया, जिसका इंतजार सभी को था। प्रातः लगभग साढ़े आठ बजे हमारा काफिला अयोध्या की पावन धरती पर पहुंच गया। शहर की परिचित गलियां और सड़कें दिखाई देते ही सभी के चेहरे खिल उठे। वाहन अपने-अपने मार्ग पर बढ़ते गए और एक-एक कर साथी अपने घरों के निकट उतरते चले गए। विदा लेते समय हर किसी की आंखों में संतोष था और होठों पर मुस्कान।

तीन दिनों तक साथ रहे साथी अब अपने-अपने घरों की ओर जा रहे थे, लेकिन इस यात्रा ने सभी को एक ऐसे रिश्ते में बांध दिया था, जो केवल सहयात्रियों का नहीं, बल्कि एक परिवार का था।

इस प्रकार हरिद्वार की आस्था, ऋषिकेश का रोमांच, मसूरी की प्राकृतिक छटा और साथियों का स्नेह अपने हृदय में संजोए हमारी यह अविस्मरणीय यात्रा संपन्न हुई। यात्रा समाप्त अवश्य हुई, लेकिन उससे जुड़ी स्मृतियां, अनुभव और आत्मीय क्षण जीवन भर हमारी पूंजी बने रहेंगे।

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