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सौतेली मां का मान रखने के लिए ध्रुव जी महाराज गए थे वन-आचार्य अनूप बाजपेई जी महाराज

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बसखारी अम्बेडकर नगर। बसखारी के भटपुरवा में चल रहे सप्त दिवसीय श्री भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य अनूप बाजपेई ने धुर्व की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि यदि यदि मनुष्य जीवन में दृढ़ संकल्प कर ले तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है। जिसका उदाहरण ध्रुव जी का जीवन है। ध्रुव जी महाराज से उनकी सौतेली मा सुरुचि ने कहा था कि यदि राजा की गोद में बैठना चाहते हो तो जाकर के तप करो और जब भगवान प्रसन्न हो जाएंगे तो वरदान मांगना की इस बार जो मेरा जन्म हो वह मेरी सौतेली मा सुरुचि के गर्भ से हो। जब तुम मेरे पुत्र के रूप में जन्म लोगे स्वयं ही पिता की गोद में बैठने के अधिकारी हो जाओगे। ध्रुव  ने सौतेली मां की बात को गांठ बांध लिया और जंगल में तप करने के लिए चल दिए। अपनी तब साधना से ध्रुव जी ने भगवान को प्रसन्न कर लिया। ध्रुव महाराज की इस कथा कहने का आशय सिर्फ इतना है कि यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति है तो हर असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।ध्रुव जी ने कहा कि आज सौतेली मां ने संसार में मुझे पूज्य और वंदनीय बना दिया। ध्रुव तारा के रूप में आज भी ध्रुव जी महाराज विराजमान है।विवाह के समय पर इन्हें दिखा करके दांपत्य जीवन मे आनंद का संकल्प किया जाता है।कथा में प्रमुख रूप से विनीत कुमार त्रिपाठी, विपिन कुमार त्रिपाठी, सभापति त्रिपाठी, चंद्र भूषण त्रिपाठी, बृजेश त्रिपाठी, अंजनी कुमार मिश्रा सहित संख्या में कथा श्रोता मौजूद रहे।

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